सोमवार, सितम्बर 23, 2019
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क्या राहुल गाँधी की सियासी राह आसान बनाएँगे गुजरात चुनाव परिणाम?

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हिमांशु पांडेय
हिमांशु पाण्डेय दा इंडियन वायर के हिंदी संस्करण पर राजनीति संपादक की भूमिका में कार्यरत है। भारत की राजनीति के केंद्र बिंदु माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु भारत की राजनीतिक उठापटक से पूर्णतया वाकिफ है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद, राजनीति और लेखन में उनके रुझान ने उन्हें पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया। हिमांशु दा इंडियन वायर के माध्यम से ताजातरीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने विचारों को आम जन तक पहुंचाते हैं।

गुजरात विधानसभा चुनाव में जिस शख्स पर सबकी नजर टिकी थी वह थे कांग्रेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष राहुल गाँधीअमेरिका के बर्कले से लौटने के बाद राहुल गाँधी के तेवरों में अप्रत्याशित बदलाव देखने को मिला था और इससे भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस के नेता भी आश्चर्य में पड़ गए थे। राहुल गाँधी ने कांग्रेस शासित हिमाचल प्रदेश की जगह भाजपा की बादशाहत वाले गुजरात में चुनाव प्रचार को प्राथमिकता दी थी और समय पूर्व चुनाव प्रचारों से काफी हद तक कांग्रेस को गुजरात में लड़ाई में ला दिया था।

राहुल गाँधी के धुआँधार चुनाव प्रचारों और कांग्रेस को मिले जातीय समीकरण के समर्थन से भाजपा अपने मजबूत दुर्ग गुजरात में बैकफुट पर आ गई थी। बीते 18 दिसंबर को जारी हुए विधानसभा चुनाव परिणामों में भाजपा गुजरात में सरकार बचाने में सफल रही थी पर पिछले 22 सालों में पहली बार वह 100 से कम सीटों पर सिमट कर रह गई थी। कांग्रेस ने अपने प्रदर्शन में सुधार करते हुए 77 सीटों पर जीत दर्ज की थी वहीं भाजपा के खाते में 99 सीटें आई थी।

सियासी पण्डितों और राजनीतिक दलों के साथ-साथ कांग्रेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष राहुल गाँधी को भी गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणामों का बेसब्री से इंतजार था। राहुल गाँधी ने हाल ही में कांग्रेस की कमान सँभाली थी और बतौर कांग्रेस अध्यक्ष गुजरात विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करना उनके लिए बेहद जरुरी थी। गुजरात विधानसभा चुनाव बतौर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की पहली अग्निपरीक्षा थे।

गुजरात के चुनाव प्रचार में राहुल गाँधी ने बहुत मेहनत की थी जिसके परिणामस्वरूप दशकों बाद कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी। गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनाव के परिणाम राहुल गाँधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के हफ्ते भर बाद ही आए थे। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस पूरी तरह मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पर आश्रित थी और राहुल गाँधी आखिरी दिनों में चुनाव प्रचार के लिए पहुँचे थे। राहुल गाँधी के सियासी भविष्य की रुपरेखा और कांग्रेस में उनकी स्वीकार्यता पूर्णतया गुजरात के चुनाव परिणामों पर निर्भर थी।

राहुल गाँधी को अब तक सियासी आलोचक और कई दिग्गज कांग्रेसी नेता कुशल राजनेता नहीं मानते थे। सत्ताधारी दल भाजपा और देश की जनता के लिए भी राहुल गाँधी की छवि एक गंभीर नेता की नहीं थी। पर गुजरात विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान में अपने बदले तेवरों से राहुल गाँधी ने सबको हक्का-बक्का कर दिया था। अब गुजरात के चुनाव परिणाम ने राहुल गाँधी की सियासी स्वीकार्यता पर भी मुहर लगा दी है।

सबको इसी बात का इंतजार था कि गुजरात विधानसभा चुनाव में राहुल गाँधी खुद को साबित कर पाते हैं या नहीं। गुजरात के चुनाव परिणाम आने के बाद राहुल गाँधी को पार्टी में वाहवाही मिल रही है और उनका सियासी कद और बढ़ गया है। अन्य कई विपक्षी दलों के नेताओं ने भी गुजरात में कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन के लिए राहुल गाँधी को बधाई दी है।

गुजरात विधानसभा चुनावों के पहले तक देश के सियासी महकमों में राहुल गाँधी की छवि एक गम्भीर राजनेता की नहीं थी। राहुल गाँधी के बारे में यह कहा जाता था कि वह जहाँ भी जाते हैं वहाँ कांग्रेस हार जाती है। 2014 के लोकसभा चुनाव, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव, महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव, हरियाणा विधानसभा चुनाव समेत तमाम ऐसे उदाहरण पड़े थे जो राहुल गाँधी की इस छवि को और भी आधार देते थे। इसके बावजूद कभी राहुल गाँधी पर इसकी आंच नहीं आई क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष का पद उनकी माँ सोनिया गाँधी के पास था।

पर अब स्थिति पूर्णतया बदल चुकी है और राहुल गाँधी कांग्रेस अध्यक्ष बन चुके हैं। इस लिहाजन आगामी चुनावों में वह कांग्रेस के प्रदर्शन के सीधे तौर पर जिम्मेदार माने जाएंगे। गुजरात में कांग्रेस के सुधरे हुए प्रदर्शन में यूँ तो कई व्यक्तियों का हाथ था पर इसका श्रेय नवनिर्वाचित कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को ही मिला। निश्चित तौर पर गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन से राहुल गाँधी की छवि में सुधार आया है।

कांग्रेस का संगठन भले ही राहुल गाँधी को हमेशा से अपना नेता मानता हो पर सत्ताधारी दल भाजपा गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें गंभीरता से नहीं लेती थी। राहुल गाँधी को लेकर बने तमाम चुटकुले और जुमले सोशल मीडिया पर प्रचारित थे और वह भाजपा नेताओं के मुँह से भी सुने जा सकते थे। विपक्ष राहुल गाँधी को राजनीति का ‘पप्पू’ मानता था। हालाँकि गुजरात में चुनाव प्रचार के लिए चुनाव आयोग ने ‘पप्पू’ शब्द के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया था।

बीते कुछ महीनों में राहुल गाँधी की सियासी समझ, हाजिरजवाबी, लोकप्रियता और राजनीतिक स्वीकार्यता में अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिले जो कांग्रेस के सियासी भविष्य के लिए अच्छे संकेत थे। राहुल गाँधी में आए यह बदलाव तभी कारगर होते जब वह अपने दम पर चुनाव परिणाम कांग्रेस के पक्ष में कर पाते। गुजरात में राहुल गाँधी सियासी माहौल को काफी हद तक भाजपा के पक्ष में करने में सफल रहे और वह गंभीर राजनेता बनकर उभरे।

राहुल गाँधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनते ही यह बात तय हो गई थी कि वह सियासत के पुराने दिग्गजों की जगह नए मोहरों संग आगे की बाजी खेलेंगे। उन्होंने 2014 लोकसभा चुनावों के पहले सचिन पायलट को अशोक गहलोत पर तरजीह देकर राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष बनाकर इसके संकेत दे दिए थे। आगामी वर्ष मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस दिग्विजय सिंह को दरकिनार कर ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुकी है।

दिल्ली में भी कांग्रेसी दिग्गज शीला दीक्षित और अजय माकन के बीच के रिश्ते जगजाहिर हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में राहुल के सामने चुनौती थी कि वह गुजरात में भाजपा को कड़ी टक्कर देकर इन युवाओं को नई राह दिखाएं जिसमें वह काफी हद तक सफल भी रहे। गुजरात विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन से राहुल गाँधी की सियासी स्वीकार्यता को और मजबूती मिली है।

बीते कुछ समय से कांग्रेस की प्रदेश इकाईयों में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था और कई बार इसकी बानगी देखने को मिली थी। कांग्रेस पार्टी में ऐसे कितने ही नेता है जिनके काम करने का तरीका राहुल गाँधी को पसंद नहीं है। राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के साथ ही यह तय हो गया कि इन नेताओं का सियासी दायरा अब सिमटता जाएगा। ऐसे में अगर गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन पहले से खराब रहता तो राहुल गाँधी की सियासी राह मुश्किल हो सकती थी।

राहुल गाँधी को इन नेताओं के शर्तिया विरोध का सामना करना पड़ सकता था। ऐसे में कांग्रेस संगठन में गुटबाजी की संभावना बढ़ जाती और सोनिया गाँधी को वापस कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की मांग उठ सकती थी। पर गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन ने इन सभी आशंकाओं पर विराम लगा दिया और आन्तरिक फूट की स्थिति पैदा होने से पहले ही समाप्त हो गई।

संगठन की मजबूती वह बिंदु है जिस पर भाजपा आज भी कांग्रेस से मीलों आगे चल रही है। कांग्रेस जमीनी हकीकत को जांचे-परखे बगैर अकेले दम पर भाजपा को सत्ता से उखाड़ फेंकने का दम्भ भरती है। अगर 2014 लोकसभा चुनावों के बाद देश में हुए विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो हकीकत खुलकर सामने आती है। कांग्रेस को तकरीबन हर चुनाव में शिकस्त ही हाथ लगी थी। बिहार, गुजरात, हिमाचल प्रदेश समेत कांग्रेस की कई राज्य इकाईयों में बगावती सुर उठे थे जो किसी लिहाज से पार्टी हित में नहीं थे।

राहुल गाँधी कांग्रेस संगठन की मजबूती के लिए काम कर रहे हैं और वह शुरूआती दौर में कार्यकर्ता स्तर के विरोध का भी सामना नहीं कर सकते हैं। ऐसे में संगठन मजबूती के लिए कांग्रेस का गुजरात जीतना बेहद जरुरी था। कांग्रेस गुजरात का रण जीत तो नहीं सकी पर भाजपा के दुर्ग में कांग्रेस का यह प्रदर्शन किसी जीत से कम नहीं है। निश्चित तौर पर कांग्रेस संगठन को गुजरात में पार्टी के प्रदर्शन से मजबूती मिलेगी।

कांग्रेस राहुल गाँधी को 2019 लोकसभा चुनावों में पीएम मोदी के मुकाबले खड़ा करने की फिराक में है। इसके लिए राहुल गाँधी की छवि चमकाने पर लगातार काम चल रहा था। राहुल गाँधी के तेवरों में भी जबरदस्त बदलाव आया है और उनको व्यापक जनसमर्थन भी मिल रहा है। केंद्र की सत्ताधारी मोदी सरकार द्वारा लागू की गई जीएसटी से छोटे व्यवसायियों और व्यापारियों की कमर टूट गई थी।

इससे पूर्व हुई नोटबंदी की वजह से व्यापारी वर्ग के साथ-साथ आम जनता को भी काफी परेशानियां उठानी पड़ी थी। भाजपा के कई नेताओं ने आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार की विफलता को लेकर बयान दिए थे। भाजपा की संगठन इकाई आरएसएस से जुड़े कई संगठन भी मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों से खुश नहीं है। ऐसे में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी इस मौके को भुनाने में लगे थे और लगातार इन मुद्दों को आधार बनाकर मोदी सरकार पर हमलावर रहे थे।

राहुल गाँधी केंद्र की सत्ताधारी मोदी सरकार को घेरने के लिए ताजातरीन मुद्दों को सूचीबद्ध कर चुके थे। उनके द्वारा चिन्हित प्रमुख मुद्दों में बेरोजगारी, किसानों की बदहाली, छोटे और मझोले उद्योगों की सुस्त पड़ती रफ्तार और कश्मीर में बेकाबू होते हालात शामिल थे। अमेरिका दौरे के दौरान राहुल गाँधी ने इन सभी मुद्दों का जिक्र किया था। राहुल गाँधी और कांग्रेस वह मुद्दे पहचान चुके हैं जो उनको सत्ता तक पहुँचा सकते है और इसी वजह से वह लगातार मोदी सरकार को घेरने में सफल रहे थे।

राहुल गाँधी कांग्रेस को पीएम मोदी पर व्यक्तिगत हमलों से इतर मुद्दा आधारित राजनीति की राह पर लौटाने में लगे हुए थे। अन्य विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त करने और विपक्ष का चेहरा बनने के लिए राहुल गाँधी को एक अदद जीत की तलाश थी। गुजरात विधानसभा चुनावों के परिणाम से राहुल गाँधी सियासी साख बढ़ी है और विपक्षी राजनीतिक दलों में उनकी स्वीकार्यता भी बढ़ी है। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने तो उन्हें 2019 में यूपीए का चेहरा और पीएम मोदी का वभिकल्प भी बता दिया था।

कांग्रेस भले ही 22 सालों बाद भी गुजरात में सत्ता वापसी करने में नाकाम रही हो पर उसका प्रदर्शन निश्चित रूप से सराहनीय रहा है। बीते 22 सालों में गुजरात भाजपा का अभेद्य दुर्ग बन चुका था और पार्टी कभी भी 100 सीटों के नीचे नहीं आई थी। कांग्रेस गुजरात विधानसभा चुनाव में बिना किसी चेहरे के उतरी थी और उसके पास मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करने के लिए कोई सशक्त उम्मीदवार नहीं था।

शंकर सिंह वाघेला की बगावत के बाद गुजरात कांग्रेस बिखर सी गई थी जो अगले 5 महीनों में पुनः पुनर्जीवित हो उठी थी। इन तमाम मुश्किलों के बावजूद भी कांग्रेस ने गुजरात के जातीय समीकरण को साध सत्ताधारी दल भाजपा को कड़ी टक्कर दी। भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार में सभी मुख्यमंत्रियों समेत पीएम मोदी और केंद्रीय मंत्रियों को भी शामिल किया था जबकि कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा राहुल गाँधी ही थे। ऐसे में भाजपा को 100 से कम सीटों पर रोकना ही राहुल गाँधी और कांग्रेस की जीत मानी जाएगी।

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