क्या मोदी के “ट्रंपकार्ड” साबित होंगे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद?

भारत के चौदहवें राष्ट्रपति

कल घोषित हुए राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों के अनुसार एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद देश के अगले राष्ट्रपति होंगे। वह 25 जुलाई को देश के चौदहवें राष्ट्रपति के पद और गोपनीयता की शपथ लेंगे। अपनी उम्मीदवारी की घोषणा के बाद से ही श्री कोविंद चर्चा में बने हुए हैं। उनकी उम्मीदवारी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खेला गया ‘दलित दांव’ कहा गया लेकिन उनका राष्ट्रपति बनना मोदी का अबतक का सबसे बड़ा ‘मास्टरस्ट्रोक’ साबित हो सकता है।

विपक्ष में पड़ी फूट

रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी को लेकर कई विपक्षी दलों में फूट नजर आई। बिहार के सत्तारूढ़ महागठबंधन से इतर होकर घटक दल जेडीयू और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कोविंद की उम्मीदवारी का समर्थन किया। वहीं केरल के जेडीयू अध्यक्ष ने अपना मत कोविंद के विरोध में दिया।

उत्तर प्रदेश में सपा में दो फाड़ नजर आये। अखिलेश यादव ने मीरा कुमार की उम्मीदवारी का समर्थन किया। सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव और भाई शिवपाल सिंह यादव ने खुलेआम कोविंद के समर्थन की बात कही। अखिलेश के फैसले से इतर 15 विधायकों ने कोविंद के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की।

गुजरात और गोवा में कांग्रेस विधायकों ने पार्टी उम्मीदवार मीरा कुमार के खिलाफ कोविंद के समर्थन में क्रॉस वोटिंग की। गुजरात में तो वरिष्ठ कांग्रेस नेता शंकर सिंह वाघेला ने बगावती रुख अपनाते हुए पार्टी से इस्तीफ़ा भी दे दिया है।

त्रिपुरा में तृणमूल कांग्रेस के 6 विधायकों ने पार्टी के खिलाफ जाते हुए रामनाथ कोविंद के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने कि धमकी भी दी है।

पंजाब में आप की सहयोगी लोक इन्साफ पार्टी के बैंस बंधुओं ने आप के खिलाफ जाकर रामनाथ कोविंद के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की। वहीं दिल्ली में आप पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाले कपिल मिश्रा ने भी रामनाथ कोविंद के पक्ष में मतदान किया।

इन क्रॉस वोटिंग की घटनाओं ने विपक्ष को और कमजोर किया है और भाजपा के लिए नए गठबंधन के रास्ते खोले हैं।

सपा में दो फाड़

हिन्दीभाषी राज्यों पर प्रभाव

रामनाथ कोविंद उत्तर प्रदेश से आते है। वे मूलतः कानपुर के निवासी है और संघ कार्यकर्ता होने के साथ-साथ भाजपा दलित मोर्चा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। डॉ. शंकरदयाल शर्मा के बाद से कोई भी हिन्दीभाषी राष्ट्रपति नहीं बना था। ऐसे में रामनाथ कोविंद का राष्ट्रपति बनना उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखण्ड, राजस्थान और हरियाणा जैसे हिन्दीभाषी राज्यों की राजनीति पर गहरा असर डालेगा। ये राज्य देश की आधी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं और इन राज्यों में बिहार को छोड़कर भाजपा हर जगह सत्ता में है। कोविंद के राष्ट्रपति बनने से इन राज्यों में भाजपा की धाक और बढ़ गई है।

उत्तर प्रदेश में कोविंद

दलितों का जीता दिल

भाजपा ने राष्ट्रपति पद के लिए दलित का नाम आगे कर कई पार्टियों के सियासी समीकरण ही बदल डाले। विपक्ष ने भी दलित उम्मीदवार चुनकर चुनावों को ‘दलित बनाम दलित’ का नाम देने की कोशिश की मगर उसकी यह कोशिश कुछ खास रंग नहीं ला सकी। दलित राजनीति करने वाली कई पार्टियां विशेषकर बसपा इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है और निश्चित रूप से उसका जनाधार घटा है। अगर केवल हिन्दीभाषी राज्यों की ही बात करें तो देश की कुल दलित आबादी का आधे से अधिक हिस्सा यहीं निवास करता है। ऐसे में कोविंद का राष्ट्रपति बनना निश्चित तौर पर इस जनाधार को अपनी ओर खींचेगा और 2019 के चुनावों में यह भाजपा की सत्ता में वापसी का मजबूत बिंदु बनकर उभरेगा।

रामनाथ कोविंद

केंद्रीय महागठबंधन की संभावनाएं हुई क्षीण

भाजपा के विजयरथ को रोकने के लिए विपक्ष ने कई राज्यों में गठबंधन की कोशिश की पर सिर्फ बिहार में यह दांव सही बैठा। इसका कारण भी नीतीश कुमार थे। काफी वक़्त से यह चर्चा थी कि केंद्र में महागठबंधन मूर्त रूप ले सकता है। इन चर्चाओं को मायावती के राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफे के बाद मिल रही प्रतिक्रियाओं से और बल मिला है। पर राष्ट्रपति चुनावों में हुई ‘क्रॉस वोटिंग’ कुछ और ही बयाँ कर रही है। सभी क्षेत्रीय पार्टियां अपना जनाधार खो रही हैं और उनमें अन्तर्कलह स्पष्ट नजर आ रही है। बिहार के महागठबंधन में भी दरार आ गई है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि अन्तर्कलह से जूझ रहीं ये पार्टियां क्या साथ खड़ी होंगी और अगर साथ आईं भी तो कितने वक़्त तक यह साथ रहेगा। उनका साथ एक मजबूत विपक्ष दे सकता है, गठबंधन के बाद भी उनके सत्ता में आने की संभावनाएं धूमिल है।

नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार के साथ कोविंद

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हिमांशु पाण्डेय दा इंडियन वायर के हिंदी संस्करण पर राजनीति संपादक की भूमिका में कार्यरत है। भारत की राजनीति के केंद्र बिंदु माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु भारत की राजनीतिक उठापटक से पूर्णतया वाकिफ है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद, राजनीति और लेखन में उनके रुझान ने उन्हें पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया। हिमांशु दा इंडियन वायर के माध्यम से ताजातरीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने विचारों को आम जन तक पहुंचाते हैं।