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कैम्ब्रिज एनालिटिका ‘डेटा लीक मामला’ व लोकतन्त्र में सेंध

कैम्ब्रिज एनालिटिका डेटा लीक

जनमत और लोकतन्त्र से खिलवाड़ करने के तरीकों में एक और नया तरीका जुड़ा है जिसे कहते हैं- डाटा माइनिंग। अर्थात लोगों के निजी डेटा को इकट्ठा करना और उसकी मदद से उनकी सोच को प्रभावित करना।

इंग्लैंड में स्थापित कम्पनी “एस.सी.एल” ग्रुप पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने पहले अमेरिकी चुनावों में और फिर “ब्रेक्सिट” के जनमत संग्रह को फेसबुक से चुराई गयी जानकारियों की मदद से प्रभावित किया है।

एससीएल ग्रुप की सदस्य कम्पनी “कैम्ब्रिज एनालिटिका” के पूर्व कर्मचारी क्रिस्टोफर वाइली ने अपनी कम्पनी से जुड़े कई सच ब्रिटिश संसद के सामने रखे।

इन विवादों में फेसबुक का नाम इसलिए जुड़ा क्योंकि इस कंपनी ने फेसबुक से ही करीब 5 करोड़ लोगों की निजी जानकारी को इकट्ठा किया था। और इस जानकारी को उन्होंने राजनैतिक हस्तियों के फायदे के लिए इस्तेमाल किया था।

फेसबुक डेटा लीक मामला

फेसबुक के इस विवाद से जुड़ने की शुरुआत तब हुई जब कैम्ब्रिज विश्विद्यालय के एक प्रोफेसर “अलेक्जेंडर कोरन” ने एक प्लेटफॉर्म बनाया जो कि फेसबुक से लोगों की निजी जानकारियां शैक्षिक जरूरतों के लिए इकट्ठा करता था। हालांकि जानकारी साझा करने से पहले उपभोक्ता की अनुमति आवश्यक होती थी।

बाद में कैम्ब्रिज अनालिटिका ने इसे खरीद लिया और इससे इकट्ठा की गयी जानकारी का गलत इस्तेमाल किया।

ब्रिटिश संसद के सामने क्रिस्टोफर वाइली ने बताया कि कैम्ब्रिज एनालिटिका दुनिया के कई देशों में राजनैतिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर चुकी है।

वाइली ने आगे दावा किया कि भारत में कांग्रेस पार्टी ने क्षेत्रीय चुनावों में कैम्ब्रिज अनालिटिका की मदद ली थी।

इस बयान से पहले ही भारतीय राजनीति में आरोप-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया था।

भाजपा से रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस और राहुल गांधी से सवाल करते हुए पूछा कि क्या वो 2019 के लोक सभा चुनावों में ऐसे ओछे तरीकों का इस्तेमाल करेंगे?

कांग्रेस के रनदीप सुरजेवाला ने इसके जवाब मे आरोप लगाये की भाजपा-जद(यू) के गठबंधन ने 2010 के बिहार चुनावों में डेटा माइनिंग कम्पनियों की मदद ली थी। तथा जद(यू) के वरिष्ठ नेता के.सी. त्यागी के पुत्र कैम्ब्रिज अनालिटिका की सहायक कम्पनी के प्रमुख हैं।

सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने फेसबुक के मालिक व मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग को भारत समन करने की चेतावनी तक दी।

हालांकि मार्क जुकरबर्ग ने आधिकारिक तौर पर फेसबुक के सभी उपभोक्ताओं से इस घटना के किये क्षमा-याचना की है, और आश्वासन दिलाया है कि आगे से ऐसा नहीं होगा।

अंतर्राष्ट्रीय इतिहास

वायली के द्वारा प्रस्तुत किये गए दस्तावेजों से कई महत्वपूर्ण बातें सामने आयीं।

यह कम्पनी भारत, ब्रिटेन और अमेरीका के अलावा नाईजीरिया, लातविया और पाकिस्तान में भी काम कर चुकी है।

ऐसी कम्पनिया सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म से उपभोक्ताओं के राजनैतिक रुझान को समझ उनके ऊपर खास केंद्रित विज्ञापन उन्हें दिखाकर उनकी सोच को प्रभावित करते हैं।

हालांकि एससीएल समूह अन्य हथकण्डे भी अपनाती थी।

जैसे:

नाइजीरिया

कुछ इलाको में किसी खास पार्टी को वोट दिलवाने से आसान होता है उसकी विरोधी पार्टी के मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक पहुंचने से रोकना।

इसलिए चुनाव के समय उन मतदाताओं को ऐसे विज्ञापन या पेज दिखाए जाते हैं। जिनको देख वह चुनावों में अपनी दिलचस्पी खो बैठे और मत डालने ही ना जाये।

इसके लिए नाइजीरिया में नकली वीडियो, धर्म गुरुओं तथा चुनाव विरोधी रैलियों का भी सहारा लिया गया।

लातविया

लातविया में चुनाव के दौरान लोगों को केंद्रों तक पहुंचने से रोकने के लिए साम्प्रदायिक दंगों का इस्तेमाल किया गया।

अमेरिका

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर भी 2016 के राष्ट्रपति चुनावों में कैम्ब्रिज अनालिटिका की मदद लेने के आरोप लगे हैं।

इससे पूर्व ‘द गार्डियन’ अखबार ने 2014 में अमेरिकी नेता टेड क्रूज पर कैम्ब्रिज अनालिटिका की मदद लेने का आरोप लगाया था।

भारत में इसके प्रभाव

भारत जैसे देश में ऐसी कम्पनियों का काम बेहद आसान हो जाता है। क्योंकि यहां किसी खास विचारधारा से सम्बंधित लोग बेहद कम हैं, और बहुतायत समाज चुनाव के मौसम में ही अपना नेता तय करता है।

ऐसे में उन पर केंद्रित फेसबुक या व्हाट्सऐप पोस्ट बना कर उन्हें बरगलाना काफी आसान साबित होगा।

जाति अथवा धर्म के नाम पर दंगे फैलाना राजनैतिक दलों का पुराना हथियार रहा है। सटीक जानकारियो के माध्यम से ऐसी कंपनियां बेहद गम्भीर दंगे फैलाने की काबिलियत रखती हैं।

इसलिए देश की एकता, अखण्डता व सम्प्रभुता की रक्षा के लिए आवश्यक है कि ऐसी कम्पनियों को हमारे देश से दूर रखा जाये।

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