क्या हैं किम जोंग उन से होने वाली डॉनल्ड ट्रम्प की मुलाकात के मायने?

डोनाल्ड ट्रम्प- किम जोंग

अमरीका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन की तरफ़ से भेजे गए मुलाकात के लिए निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है। इससे दोनों देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही तनातनी के कुछ वक्त के लिए शांत होने की उम्मीद जताई जा रही है।

इसी हफ्ते उत्तर कोरियाई तानाशाह ने दक्षिण कोरिया के दो वरिष्ठ अधिकारियों को खाने पर बुलाया। इसके पश्चात् दोनों अधिकारी अमरीका के लिए उड़े, उनके पास किम जोंग की तरफ़ से भेजा गया राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ मुलाकात के लिए निमंत्रण था। इसमें उत्तर कोरिया का परमाणु निरस्त्रीकरण का प्रस्ताव भी शामिल था और बातचीत के दौर में किसी भी तरह के मिसाइल परिक्षण को रोकने जैसी बातें भी।

अमरीकी राष्ट्रपति ने भी ज़्यादा वक्त जाया किये बगैर इसे स्वीकार कर लिया है। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे इन ने इस ख़बर को एक “चमत्कार” की तरह बताया है।

तो क्यों होगी ये मुलाकात बेहद महत्वपूर्ण?

2016 में डॉनल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपति बनने से पहले किम जोंग उन के साथ मिलने की इच्छा प्रकट की थी और इसके बाद कोरिया ने ट्रम्प को एक बुद्धिमान नेता बताया था।

लेकिन राष्ट्रपति पद ग्रहण करने के बाद से ही उत्तर कोरिया ने अपनी मिसाइल तकनीक का कई बार परिक्षण किया और विशेषज्ञों की उम्मीद से परे, काफ़ी जल्द ही मिसाइल को अमरीका तक पहुँच के लायक बनाने में भी सफल हो गया। पिछले साल 3 सितंबर को उसने अपने 6वें और सबसे बड़े परमाणु बम परिक्षण को अंजाम दिया।

इसके बाद से ही दोनों देशों के बीच पहले से ही नाज़ुक रिश्ते और तनावपूर्ण हो गए। अमरीका-उत्तर कोरिया के नेताओं ने एक-दूसरे की तरफ़ कड़े और नफरत से भरे शब्दों का इस्तेमाल किया और एक-दूसरे को पूरी तरह से तबाह कर देने की धमकी भी दी।

उत्तर कोरिया अब तक कुल 6 बार परमाणु बम का धरती की सतह के भीतर परिक्षण कर चुका है और लंबी दूरी की मिसाइल के विकास में भी बड़ा निवेश किया है, इन मिसाइलों का साफ़ तौर पर उद्देश्य अमरीका की धरती तक पहुंचना है। इसी वजह से अमरीका से बातचीत की शुरुआत और परमाणु हथियार के निरस्त्रीकरण की बातें ज़ाहिर तौर पर एक बड़ी पहल है। यह पहली बार है जब किसी अमरीकी राष्ट्रपति की अपने उत्तर कोरियाई समकक्ष के साथ मुलाकात होगी।

महीनों से निवेशकों को अमरीका-उत्तर कोरिया के टकराव होने का डर सता रहा है, इसलिए जब दोनों देशों के नेतृत्व के बीच बातचीत की बात सामने आई तो पूर्वी एशियाई शेयर बाजारों में अच्छा उछाल देखा गया।

हालांकि इन सब के बीच संदेह के बादल भी हैं। अभी तक इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई है की परमाणु निरस्त्रीकरण जैसे बड़े प्रस्ताव के बदले उत्तर कोरिया अमरीका से क्या चाहता है और इस वक्त तक मुलाकात के समय व जगह के बारे में भी कोई सूचना नही मिली है।

विशेषज्ञों ने भी उत्तर कोरिया के साथ बेहद सतर्कतापूर्ण रवैया अपनाने की सलाह दी है क्योंकि हमेशा ही उत्तर कोरिया ने बातचीत की किसी भी तरह की कोशिश को अचानक बीच में ही छोड़ दिया है। ऐसी आख़िरी बड़ी पहल 2008 में हुई थी, तब उत्तर कोरिया ने अन्तराष्ट्रीय परमाणु इंस्पेक्टर्स को उसके परमाणु प्रोग्राम के निरीक्षण से रोक दिया था।

उनका यह भी मानना है की उत्तर कोरिया के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के कठोर प्रतिबंधों ने उसे अपने घुटनों पर ला दिया है और यही वजह है की बातचीत की दोबारा पहल से उसे इसमें ढील की उम्मीद है।

जहाँ जापान ने भी उत्तर कोरिया से सतर्कता बरतने की सलाह दी है वहीँ चीन ने इसे सही दिशा में उठाया कदम ठहराया है। लेकिन इस नए घटनाक्रम से सबसे उम्मीदें दक्षिण कोरिया को होंगी जोकि तकनीकी तौर पर अभी भी उत्तर कोरिया के साथ जंग में है और अमरीका-उत्तर कोरिया के संघर्ष से सबसे ज़्यादा जान-माल के नुकसान का खतरा उसे ही है।

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