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कर्मवीर – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

कर्मवीर कविता

देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं।

रह भरोसे भाग के दुख भोग पछताते नहीं।

काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नहीं।

भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं।

हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले।

सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले।1।

आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही।

सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही।

मानते जी की हैं सुनते हैं सदा सब की कही।

जो मदद करते हैं अपनी इस जगत में आप ही।

भूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहीं।

कौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं।2।

जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहीं।

काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं।

आजकल करते हुए जो दिन गँवाते हैं नहीं।

यत्न करने में कभी जो जी चुराते हैं नहीं।

बात है वह कौन जो होती नहीं उनके किए।

वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिए।3।

व्योम को छूते हुए दुर्गम पहाड़ों के शिखर।

वे घने जंगल जहाँ रहता है तम आठों पहर।

गर्जते जल-राशि की उठती हुई ऊँची लहर।

आग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लवर।

ये कँपा सकतीं कभी जिसके कलेजे को नहीं।

भूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं।4।

चिलचिलाती धूप को जो चाँदनी देवें बना।

काम पड़ने पर करें जो शेर का भी सामना।

जो कि हँस हँस के चबा लेते हैं लोहे का चना।

”है कठिन कुछ भी नहीं” जिनके है जी में यह ठना।

कोस कितने ही चलें पर वे कभी थकते नहीं।

कौन सी है गाँठ जिसको खोल वे सकते नहीं।5।

ठीकरी को वे बना देते हैं सोने की डली।

रेग को करके दिखा देते हैं वे सुन्दर खली।

वे बबूलों में लगा देते हैं चंपे की कली।

काक को भी वे सिखा देते हैं कोकिल-काकली।

ऊसरों में हैं खिला देते अनूठे वे कमल।

वे लगा देते हैं उकठे काठ में भी फूल फल।6।

काम को आरंभ करके यों नहीं जो छोड़ते।

सामना करके नहीं जो भूल कर मुँह मोड़ते।

जो गगन के फूल बातों से वृथा नहिं तोड़ते।

संपदा मन से करोड़ों की नहीं जो जोड़ते।

बन गया हीरा उन्हीं के हाथ से है कारबन।

काँच को करके दिखा देते हैं वे उज्ज्वल रतन।7।

पर्वतों को काटकर सड़कें बना देते हैं वे।

सैकड़ों मरुभूमि में नदियाँ बहा देते हैं वे।

गर्भ में जल-राशि के बेड़ा चला देते हैं वे।

जंगलों में भी महा-मंगल रचा देते हैं वे।

भेद नभ तल का उन्होंने है बहुत बतला दिया।

है उन्होंने ही निकाली तार तार सारी क्रिया।8।

कार्य्य-थल को वे कभी नहिं पूछते ‘वह है कहाँ’।

कर दिखाते हैं असंभव को वही संभव यहाँ।

उलझनें आकर उन्हें पड़ती हैं जितनी ही जहाँ।

वे दिखाते हैं नया उत्साह उतना ही वहाँ।

डाल देते हैं विरोधी सैकड़ों ही अड़चनें।

वे जगह से काम अपना ठीक करके ही टलें।9।

जो रुकावट डाल कर होवे कोई पर्वत खड़ा।

तो उसे देते हैं अपनी युक्तियों से वे उड़ा।

बीच में पड़कर जलधि जो काम देवे गड़बड़ा।

तो बना देंगे उसे वे क्षुद्र पानी का घड़ा।

बन ख्रगालेंगे करेंगे व्योम में बाजीगरी।

कुछ अजब धुन काम के करने की उनमें है भरी।10।

सब तरह से आज जितने देश हैं फूले फले।

बुध्दि, विद्या, धान, विभव के हैं जहाँ डेरे डले।

वे बनाने से उन्हीं के बन गये इतने भले।

वे सभी हैं हाथ से ऐसे सपूतों के पले।

लोग जब ऐसे समय पाकर जनम लेंगे कभी।

देश की औ जाति की होगी भलाई भी तभी।

—अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

प्रश्न-उत्तर

क) देखकर बाधा विविध, ………………………………. वे कर जिसे सकते नहीं |
१) प्रस्तुत पद्यखंड में कवि ने किसकी प्रशंसा की है ? कवि का परिचय दीजिये |
उत्तर: कवि अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जी आधुनिक युग के मूर्धन्य कवि हैं | इनके प्रमुख ग्रन्थ हैं ‘प्रियप्रवास’, ‘वैदेही वनवास’, और ‘रसकलश’ | ‘हरिऔध’ जी का ब्रजभाषा और खड़ी बोली पर समान अधिकार रहा है | उन्होंने कई उपन्यास तथा नाटक भी लिखे हैं | प्रस्तुत पद्य खंड में कवि कर्मवीरों की प्रशंसा कर रहे हैं |

२) कर्मवीर को पछतावा क्यों नहीं होता ?
उत्तर: मुसीबत चाहे कितनी भी बड़ी हो, कर्मवीर उससे घबराते नहीं हैं | चाहे काम कितना भी कठिन हो किन्तु वो उससे उकताते नहीं हैं | वे भाग्य के भरोसे नहीं बैठे रहते, इसलिए उन्हें कभी पछतावा नहीं होता |

३) सब जगह, सब काल में फूलने-फलने का क्या मतलब है ?
उत्तर: कवि के अनुसार कर्मवीर हर जगह, हर काल में फूलते-फलते हैं अर्थात सफलता प्राप्त करते हैं | उनमें ऐसे गुण होते हैं कि एक ही क्षण में उनका बुरा समय भी अच्छा बन जाता है | कैसी भी विपत्ति आ जाए वो उस समय घबराते नहीं हैं | कठिन से कठिन काम हो तो भी वो परेशान होकर उसे छोड़ते नहीं | इन सब गुणों की वजह से, कर्मवीर को संसार के हर कोने में सफलता मिलती है | हर काल में सफलता मिलती है |

४) कर्मवीर के लिए कोई भी कार्य असंभव क्यों नहीं है ?
उत्तर: संसार में ऐसा कोई कार्य नहीं है जिसे कर्मवीर नहीं कर सकते | वो अपने काम के लिए किसी और पर आश्रित नहीं रहते | वो स्वयं का कार्य स्वयं ही करते हैं | कार्य चाहे कितना भी कठिन हो किन्तु वो उससे परेशान होकर उस काम को छोड़ते नहीं हैं | जिस कार्य को जिस समय करना हो, वो उसे उसी समय पूरा कर देते हैं, बाद के लिए नहीं छोड़ते | इन सब गुणों के कारण कर्मवीर के लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं है |

५) कर्मवीर निर्णय किस प्रकार लेते हैं ?
उत्तर: कर्मवीर निर्णय लेने से पहले सभी के सुझाव, सभी की बातें सुनते हैं किंतु निर्णय हमेशा अपने मन से ही लेते हैं | किसी अन्य व्यक्ति के दबाव में उनका निर्णय प्रभावित नहीं होता |

ख) जो कभी अपने समय को …………………….. जिसको खोल वे सकते नहीं |
१) कर्मवीर समय को किस प्रकार महत्व देते हैं ?
उत्तर: कर्मवीर के लिए समय बहुत महत्व का होता है | वो जिस काम को जिस समय करना हो, उसे उसी समय कर देते हैं | उसे कल पर नहीं छोड़ते | वो अपने समय को कभी व्यर्थ जाने नहीं देते | जहाँ काम करना हो वो वहाँ काम करते हैं, बातों में समय व्यर्थ नहीं करते | आज का काम कल पर धकेल कर वो अपने दिनों को व्यर्थ नहीं करते | समय का सदुपयोग कर्मवीरों का महत्वपूर्ण गुण है |

२) कर्मवीर दूसरों के लिए आदर्श क्यों होते हैं ?
उत्तर: कर्मवीर में कई ऐसे गुण होते हैं जिनके कारण उन्हें संसार में अपार सफलता मिलती है | वो अपने पुरुषार्थ से समय का सदुपयोग करते हुए असंभव को भी संभव बना देते हैं | वो कभी भी सहायता के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहते | इन सब कारणों से वो पूरे संसार के लिए आदर्श बन जाते हैं | यदि किसी भी व्यक्ति को संसार में सफलता प्राप्त करनी है तो उन्हें कर्मवीर के गुणों को अपनाना चाहिए |

३) “कर्मवीर असंभव को भी संभव बना देते हैं”, इस बात को बताने के लिए कवि ने किन उपमाओं का सहारा लिया है ?
उत्तर: कवि के अनुसार कर्मवीर चिलचिलाती धूप को भी चाँदनी बना देते हैं | काम पड़ने पर शेर का भी सामना कर लेते हैं | हँसते-हँसते वो लोहे का चना भी चबा लेते हैं | चाहे कितनी भी दूर चलना पड़े, कर्मवीर नहीं थकते | संसार में ऐसी कोई गाँठ नहीं है जिसे वो नहीं खोल सकते | इन सब उपमाओं द्वारा कवि ने यह बताया है कि कर्मवीर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है |

४) ‘गाँठ खोलने’ से कवि का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: गाँठ खोलने का अर्थ है समस्याओं का हल निकालना | कर्मवीर अपने पुरुषार्थ से कैसी भी गाँठ खोल सकते हैं अर्थात किसी भी समस्या को हल कर सकते हैं | इस मुहावरे के द्वारा कवि यह बताना चाह रहे हैं कि कर्मवीर के लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं है |

ग) काम को आरम्भ करके …………………………………… तार की सारी क्रिया |
१) काम को आरंभ करके बीच में छोड़ना किस प्रकार के व्यक्ति का लक्षण है ?
उत्तर: किसी भी काम को आरंभ करके फिर उसे बीच में छोड़ देना आलसी और धैर्यहीन व्यक्ति का लक्षण है | काम को पूरा करते समय यदि कोई मुसीबत आ जाए, तो कई लोग उस मुसीबत का सामना करने के बजाय काम को ही छोड़ देते हैं | ऐसे लोग स्वभाव से कायर होते हैं | कर्मवीर व्यक्ति कभी भी मुसीबत से मुँह नहीं मोड़ते | वह उनका मुकाबला करते हैं | कर्मवीर जो काम एक बार प्रारंभ करते हैं, उसे पूरा किये बिना कभी नहीं छोड़ते |

२) गगन के फूलों को बातों से तोड़ने का क्या अर्थ है ?
उत्तर: कवि ने पद्यांश में लिखा है कि कर्मवीर व्यक्ति गगन के फूलों को बातों से व्यर्थ में नहीं तोड़ते | इससे कवि बताना चाह रहे हैं कि कर्मवीर व्यक्ति सिर्फ अपनी प्रशंसा के लिए बड़ी-बड़ी बातें नहीं बनाते | जो काम करना हो वो उसे करके दिखाते हैं | इस पद्यांश द्वारा कवि मनुष्य को शब्दवीर की बजाय कर्मवीर बनने की प्रेरणा दे रहे हैं |

३) कर्मवीर मन से करोड़ों की संपदा क्यों नहीं जोड़ता ?
उत्तर: कई लोगों का स्वभाव होता है कि वो हमेशा मन में सोचते रहते हैं कि मैं यह कर लूँगा, वह कर लूँगा | उनके बड़े-बड़े लक्ष्य मन में बनते हैं और मन में ही नष्ट हो जाते हैं | वास्तविक जीवन में ऐसे लोग बिलकुल पुरुषार्थ नहीं करते | कर्मवीर व्यक्ति ऐसे मनोराज्य में अपना समय नहीं गँवाते | जिस कार्य को करना हो वो बस उस कार्य को करने पर ध्यान देते हैं | इसलिए कवि ने लिखा है कि कर्मवीर व्यक्ति मन से करोड़ों की संपदा नहीं जोड़ता |

४) किन उदाहरणों द्वारा कवि ने यह बताया है कि कर्मवीर व्यक्ति साधारण वस्तुओं को भी मुल्यवान बना देते हैं ?
उत्तर: कवि के अनुसार कर्मवीर व्यक्ति साधारण कार्बन को बहुमूल्य हीरे में बदल देता है | वो काँच के साधारण टुकड़ों को उज्ज्वल रत्नों में परिवर्तित कर देता है | इन उदाहरणों द्वारा कवि ने यह बताया है कि कर्मवीर व्यक्ति साधारण वस्तुओं को भी मुल्यवान बना देते हैं |

५) प्रस्तुत पद्यांश के अनुसार कर्मवीरों ने किस प्रकार प्रकृति पर विजय पाकर मनुष्य का जीवन आसान बनाया है ?
उत्तर: कर्मवीर पर्वतों को काटकर सड़कें बना देते हैं | वो नदियों का रास्ता बदलकर उन्हें मरुस्थलों में भी ले जाते हैं और उसे भी हरा भरा बना देते हैं | विशाल समुद्र और नदियों में चलनेवाले जहाज भी कर्मवीरों ने बनाये हैं | इस प्रकार प्रकृति ने मनुष्य की जो सीमाएँ तय की थी, कर्मवीरों ने अपने पुरुषार्थ से उन सीमाओं को पार कर लिया है |

६) नभ-तल के भेद बतलाने का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: मनुष्य के लिए विशाल अंतरिक्ष हमेशा से जिज्ञासा का स्रोत रहा है | वो हमेशा से चाँद-सितारों के बारे में जानना चाहता रहा है | बहुत लम्बे समय तक यह संभव नहीं था किंतु आजकल मनुष्य ने विज्ञान के क्षेत्र में अत्यधिक प्रगति कर ली है | उसने विभिन्न यंत्रों द्वारा, प्रयोगों द्वारा, यान भेजकर अंतरिक्ष के कई राज जान लिए हैं | धरती के चारों ओर घूमने वाले ग्रहों, उपग्रहों और तारों के बारे में आज मनुष्य बहुत कुछ जानता है | ऐसा कर्मवीरों के अथक प्रयत्नों से ही संभव हो सका है |

घ) कार्य-स्थल को वे कभी नहीं पूछते ……………………………… होगी भलाई भी तभी |
१) कर्मवीर के लिए कार्यस्थल की सीमा क्यों नहीं है ?
उत्तर: कर्मवीर अपने लिए कभी कार्य-स्थल नहीं खोजते | वो जहाँ होते हैं, वही उनका कार्यस्थल होता है | उन्हें जहाँ चुनौती मिली, वो उसका सामना वहीं करते हैं | उनपर जितनी उलझनें आती हैं, ये उनका सामना उतने ही उत्साह से करते हैं | चाहे विरोधी कितनी ही अडचनें डाले, कर्मवीर उस जगह से अपना काम किये बिना नहीं टलते | इसलिए कर्मवीर के लिए कार्य-स्थल की कोई सीमा नहीं है | जहाँ उन्हें संकट या चुनौती मिले वो उसे ही अपना कार्यस्थल बना लेते हैं |

२) विकसित देशों की संपन्नता का क्या कारण है ?
उत्तर: वर्तमान समय के विकसित और संपन्न देश हमेशा से संपन्न नहीं थे | वहाँ कर्मवीरों ने जन्म लिया और अपने हाथों से देश का भविष्य बनाया | देश के विकास को एक नई गति दी | देश को बुद्धि, विद्या, धन, वैभव का भंडार बनाया | कर्मवीरों के पुरुषार्थ से ही आज वो देश इतने संपन्न और विकसित हैं |

३) देश और मनुष्य जाति की भलाई कैसे होगी ?
उत्तर: देश को ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता है जो कर्म के लिए अपना जीवन समर्पित कर सके | जो अपने पुरुषार्थ से देश का भविष्य बनाये | देश को बुद्धि, विद्या, धन, वैभव का भंडार बनाये | जब ऐसे लोगों का जन्म देश में होने लगेगा तो देश की और मनुष्य जाति की भलाई होगी | आज संसार में जितने भी संपन्न और विकसित देश हैं वो ऐसे कर्मवीरों के पुरुषार्थ से ही संपन्न हुए हैं |

४) इस पद्य खंड से कवि क्या संदेश दे रहे हैं ?
उत्तर: कवि इस पद्य खंड द्वारा यह संदेश देना चाहते हैं कि इस संसार में प्रगति करनी है तो पुरुषार्थ करना ही पड़ेगा | कितनी भी असफलता मिले, मनुष्य को बिना हिम्मत हारे प्रयत्न करते रहना चाहिये | मनुष्यता का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जब अपनी मेहनत से मनुष्य ने असंभव को संभव कर दिखाया है | आज हम अपने चारों ओर जो सभ्यता देख रहे हैं, इसके विकास के लिए अनगिनत लोगों ने बिना हार माने अथक प्रयत्न किया है | कवि ऐसे लोगों को कर्मवीर कहते हैं |

अतिरिक्त प्रश्न

१) पुरुषार्थ ही मनुष्य की सफलता का रहस्य है | इस विषय पर अपने विचार लिखिए |
उत्तर: जीवन में यदि सफलता प्राप्त करनी हो तो मनुष्य को पुरुषार्थ करना ही पड़ता है | बिना पुरुषार्थ के अन्य सारी योग्यताएँ गौण हो जाती हैं | यदि मनुष्य में बहुत प्रतिभा हो किंतु वो पुरुषार्थ न करे तो जीवन में सफलता नहीं प्राप्त कर सकता | इसके विपरीत कम प्रतिभा वाला व्यक्ति भी पुरुषार्थ करके जीवन में ऊँचा स्थान प्राप्त कर सकता है | पुरुषार्थी व्यक्ति के लिए कोई कार्य असंभव नहीं है | अतः यदि मनुष्य को जीवन में सफल बनना है तो उसे पुरुषार्थी बनना ही पड़ेगा | पुरुषार्थ ही सफलता की कुंजी है |

२) कर्म को पूजा मानने से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: यह संसार ऐसे कर्मवीरों के कारण ही चल रहा है जो कर्म को पूजा समझते हैं | वो कभी अपने काम में आलस्य नहीं करते | किसी भी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझते | कर्म उनके लिए बोझ नहीं है | जो काम जब करना है, उस काम को उसी समय पूरा करते हैं | ऐसा करनेवाला व्यक्ति न केवल जीवन में सफल होता है बल्कि उसके मन में सुख तथा शांति होती है | कर्म में लगे होने के कारण उसके मन में पाप प्रवेश नहीं करता | इसलिए कर्म को पूजा समझा जाता है |

३) समय का महत्व और सफलता एक दूसरे पर आधारित हैं |’ कविता के आधार पर इस कथन को स्पष्ट कीजिये |
उत्तर: समय निरंतर गतिशील है | समय का चक्र लगातार घूमता रहता है | वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता | जो व्यक्ति समय व्यर्थ नहीं करता, सफलता उसके कदम चूमती है | जो व्यक्ति व्यर्थ की बातों में अपना समय नष्ट करते है, वे किसी कार्य को समय में पूरा नहीं कर पाते | वे प्रत्येक कार्य को कल कर लेंगे कहकर टाल देते है | इस प्रकार वे कार्य को आज-कल पर डालकर समय नष्ट करते हैं और पिछड़ जाते है | वे जीवन में सफलता से वंचित रह जाते हैं | अतः कहा जा सकता है कि समय का महत्व और सफलता एक दूसरे पर आधारित हैं |

लेखक के बारे में जानकारी

अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध (ayodhya-singh-upadhya-hariaodh – 15 अप्रैल, 1865-16 मार्च, 1947) का जन्म उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले के निजामाबाद नामक स्थान में हुआ। उनके पिता पंडित भोलानाथ उपाध्याय ने सिख धर्म अपना कर अपना नाम भोला सिंह रख लिया था । हरिऔध जी ने निजामाबाद से मिडिल परीक्षा पास की, किंतु स्वास्थ्य बिगड़ जाने के कारण उन्हें कॉलेज छोड़ना पड़ा। उन्होंने घर पर ही रह कर संस्कृत, उर्दू, फ़ारसी और अंग्रेजी आदि का अध्ययन किया और १८८४ में निजामाबाद के मिडिल स्कूल में अध्यापक हो गए । सन १८८९ में हरिऔध जी को सरकारी नौकरी मिल गई। सरकारी नौकरी से सन १९३२ में अवकाश ग्रहण करने के बाद हरिऔध जी ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अवैतनिक शिक्षक के रूप में १९३२से १९४१ तक अध्यापन कार्य किया। उनकी प्रसिद्ध काव्य रचनाएँ हैं: – प्रिय प्रवास, वैदेही वनवास, काव्योपवन, रसकलश, बोलचाल, चोखे चौपदे, चुभते चौपदे, पारिजात, कल्पलता, मर्मस्पर्श, पवित्र पर्व, दिव्य दोहावली, हरिऔध सतसई ।

About the author

विकास सिंह

विकास नें वाणिज्य में स्नातक किया है और उन्हें भाषा और खेल-कूद में काफी शौक है. दा इंडियन वायर के लिए विकास हिंदी व्याकरण एवं अन्य भाषाओं के बारे में लिख रहे हैं.

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