मंगलवार, अक्टूबर 15, 2019

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में पेयजल संकट और अवैध खनन के खिलाफ किसान आंदोलन को सामाजिक संगठनों का समर्थन

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पंकज सिंह चौहान
पंकज दा इंडियन वायर के मुख्य संपादक हैं। वे राजनीति, व्यापार समेत कई क्षेत्रों के बारे में लिखते हैं।

बांदा, 20 मई (आईएएनएस)| उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में पेयजल संकट और केन नदी में हो रहे अवैध खनन के खिलाफ किए जा रहे आमरण अनशन के पक्ष में अब आम लोगों के साथ कई सामाजिक संगठनों ने भी कूदने का ऐलान किया है। किसानों का अनशन सोमवार को छठे दिन भी जारी है और किसान जिलाधिकारी कार्यालय के घेराव के बाद केन नदी में ‘जल सत्याग्रह’ करने वाले हैं।

बुंदेलखंड के बांदा जिले में पेयजल संकट और केन नदी में अवैध खनन के विरोध में ‘बुंदेलखंड किसान यूनियन’ के अध्यक्ष विमल शर्मा की अगुआई में पिछले छह दिनों से जिला मुख्यालय के अशोक लॉट तिराहे पर किसानों द्वारा किए जा रहे आमरण अनशन का समर्थन कई सामाजिक संगठनों ने भी किया है, संगठनों ने इसे ‘केन बचाओ आंदोलन’ नाम दिया है।

पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, किसान दोपहर में पहले जिलाधिकारी कार्यालय का घेराव करेंगे, इसके बाद सैकड़ों की तादाद में पहुंच कर केन नदी में ‘जल सत्याग्रह’ करेंगे।

विमल शर्मा ने आरोप लगाया, “प्रशासन बालू माफियाओं के दबाव में है, इसीलिए केन नदी से मशीनें हटवाने के बजाय अनशन स्थल की बिजली कटवाकर किसानों को भयभीत करने की कार्यवाही शुरू की गई है। लेकिन किसान प्यास से मरने के बजाय प्रशासन के हाथों मरना पसंद करेंगे।”

उन्होंने कहा कि घेराव और ‘जल सत्याग्रह’ के बाद आंदोलन की अगली रणनीति बनाई जाएगी।

इस बीच किसानों के आंदोलन को कई सामाजिक संगठनों ने भी समर्थन देने का ऐलान किया है।

‘बुंदेलखंड आजाद सेना’ के प्रमुख प्रमोद आजाद ने सोमवार को कहा कि किसान पेयजल संकट के निदान और जीवन दायिनी केन नदी को बचाने का प्रयास कर रहे हैं, इसके विपरीत प्रशासन दमनकारी नीति अपना रहा है। उनका संगठन भी किसानों के आंदोलन में हिस्सा लेगा।

‘पब्लिक एक्शन कमेटी’ (पीएसी) की प्रमुख श्वेता मिश्रा ने चेतावनी दी कि अगर 24 घंटे के भीतर समस्याओं का निस्तारण न हुआ तो उनका संगठन किसानों की लड़ाई को आगे बढ़ाएगा।

‘नदी-तालाब बचाओ’ आंदोलन के संयोजक और ‘कृषि एवं पर्यावरण संस्थान’ के निदेशक सुरेश रैकवार ने इसे ‘केन नदी बचाओ आंदोलन’ का नाम देकर कहा कि ‘प्रशासन को अपनी हठधर्मिता छोड़ किसानों की मांगों पर गौर करना चाहिए। यदि उचित निदान न किया गया तो शीघ्र ‘जलपुरुष’ राजेन्द्र सिंह को बुलाकर केन नदी में ‘डेरा डालो, घेरा डालो’ आंदोलन शुरू किया जाएगा।

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