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    “आये जब दल-बदलकर नेता नंदूलाल,
    पत्रकार करने लगे ऊल-जूलूल सवाल।।”
    काका हाथरसी

    हिंदी के मशहूर हास्य कवि “काका हाथरसी” की ये पंक्तियां उनके ही गृह-राज्य उत्तर-प्रदेश की सियासी गलियों में आजकल जो हलचल है, उसपर सौ फीसदी सही मालूम पड़ती है।

    उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के तारिखों के ऐलान होने के बाद अब नेताओं का एक दल से दूसरे दल में आना-जाना बदस्तूर जारी है। हर सुबह कोई ना कोई नेता पाला बदल रहा है और उसके बाद शाम तक प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लेकर दिल्ली तक तमाम पार्टियों के नेता और मुख्यालयों तक मीडिया की धमा-चौकड़ी देखने को मिल रहा है।

    दल बदल की राजनीति भारत के लोकतंत्र में अब कोई नई बात नहीं है। भारत की राजनीति अब विचारधारा की राजनीति से ज्यादा मौका-परस्ती की राजनीति और सत्ता के मलाई की राजनीति बन गयी है। ऐसे में हर चुनाव के पहले ऐसे चुनावी सर्कस और भागदौड़ अब एक आम बात है; परंतु जब एक नेता पार्टी बदल लेता है तो सबसे ज्यादा मुश्किल उसके समर्थकों के लिए हो जाता है जो कल तक अपने नेता के लिए किसी एक पार्टी का झंडा उठा रहे होता है, आज उसे किसी दूसरे पार्टी का झंडा उठाना पड़ता है।

    महत्वपूर्ण चेहरे जिन्होंने दल बदल लिया…

    सबसे पहले यूपी कैबिनेट में श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्या और उसके बाद उनके पीछे पर्यावरण मंत्री दारा सिंह चौहान सहित अभी 13 जनवरी के शाम तक सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के कुल 14 विधायकों ने अपना इस्तीफ़ा दे दिया है। इनमें अन्य प्रमुख नाम धर्म सिंह सैनी, ब्रजेश प्रजापति, रोशनलाल वर्मा, विनय शाक्य, अवतार सिंह भड़ाना इत्यादि हैं। चर्चा यह है कि अभी और भी विधायकों का इस्तीफ़ा देखने को मिल सकता है।

    क्या है वजह अचानक हुए इस्तीफों के पीछे?

    इस्तीफा सौंपने वाले तमाम नामों के बीच सबसे प्रमुख स्वामी प्रसाद मौर्या ने पार्टी छोड़ने के बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर आरोप लगाया कि पिछले 5 सालों में दलितों, पिछडों, किसानों और बेरोजगारों की उपेक्षा की जा रही थी। लगभग यही बात और इसी तरह की भाषा का प्रयोग धर्म सिंह चौहान ने भी अपने इस्तीफ़े में किया है। बीजेपी छोडक़र जाने वाले तमाम अन्य विधायकों के इस्तीफ़े को भी पढ़ा जाए तो लगभग सभी विधायकों ने एक ही तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है।

    बता दें, कि 2017 में बसपा छोड़कर बीजेपी में आने वाले स्वामी प्रसाद मौर्या ने अब समाजवादी पार्टी का झंडा थाम लिया है।

    अंदरखाने से खबर ये भी है कि स्वामी अपने बेटे के लिए टिकट मांग रहे थे और जब पार्टी ने उनकी बात नहीं मानी तो उन्होंने पार्टी छोड़कर सपा में जाने का फैसला किया। और उसके बाद विधायकों का बीजेपी छोड़कर जाने का सिलसिला जो शुरू हुआ, वो लगातार जारी है।

    इन इस्तीफों का क्या होगा असर??

    राजनीति के पंडितों की माने तो इन इस्तीफों से बीजेपी की एमबीसी (Most Backward Class), गैर-यादव ओबीसी, गैर-जाटव दलित और अपर कास्ट को साथ लेकर चुनाव जीतने वाली सोशल इंजीनियरिंग में जबरदस्त सेंध पड़ सकता है। पार्टी छोड़कर जाने वाले ज्यादातर विधायक ओबीसी कोटे से आते हैं।

    जानकर बताते हैं कि बीजेपी इस बार अपने कम से कम 100 वर्तमान विधायकों के टिकट काटने वाली थी। पर न्यूटन के भौतिक विज्ञान के नियम के विपरीत यहाँ एक्शन से पहले ही रिएक्शन आ गया। इस से निश्चित ही बीजेपी हाई-कमांड के टिकट वितरण से जुड़े फैसले पर असर पड़ना लाज़िमी माना जा रहा है।

    इस्तीफे से विपक्षी पार्टियों को कितना फायदा, कितना नुकसान??

    इस्तीफ़ा देने वाले मंत्रियों और विधायकों ने योगी सरकार में पिछड़ों की कथित उपेक्षा का गंभीर आरोप लगाया है जिसे समय रहते अगर संभाला नही गया तो निश्चित ही विपक्षी दल ख़ासकर समाजवादी पार्टी को फ़ायदा पहुचने वाला है।
    स्वामी प्रसाद मौर्या ने बीजेपी से निकलते ही सपा का दामन थाम लिया।

    चूँकि भारत मे नए कामों को करने के पहले शुभ मुहूर्त देखकर कोई योजना प्रारंभ की जाती है। ऐसे में यह संभावना भी है कि संक्रांति के बाद (खरमास के बाद) जब अच्छे मुहूर्त आएंगे तो यह संख्या बढ़ेंगी।

    अब आगे क्या??

    “डूबते जहाज़ को चूहे पहले छोडक़र भागते हैं।” -यह कहावत बहुत ही प्रचलित है। क्या बीजेपी की सत्ता की नाव किसी मुश्किल में है जिससे घबराकर तमाम विधायकों ने इस्तीफ़ा दिया है; ये तो वक़्त बताएगा।

    बहरहाल,अभी इस दल बदल की राजनीति से किसका कितना नफ़ा कितना नुकसान होगा, असल में यह तो 10 मार्च को चुनाव परिणाम के साथ ही सामने आएगा।

    By Saurav Sangam

    | For me, Writing is a Passion more than the Profession! | | Crazy Traveler; It Gives me a chance to interact New People, New Ideas, New Culture, New Experience and New Memories! ||सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ; | ||ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ !||

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