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पहली भारतीय साउंड फिल्म “आलम आरा” को आज पूरे हुए 88 साल, जानिए फिल्म के बारे में कम ज्ञात तथ्य

पहली भारतीय साउंड फिल्म "आलम आरा" को आज पूरे हुए 88 साल, जानिए फिल्म के बारे में कम ज्ञात तथ्य

आज भारतीय सिनेमा पूरे विश्व भर में बहुत मशहूर हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि इसकी पहली साउंड फिल्म “आलम आरा” को आज 88 साल पूरे हो चुके हैं। भारतीय सिनेमा के पिता दादासाहेब फाल्के ने 1913 में फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ से भारतीय सिनेमा की नींव रखी थी। जबसे, फिल्म इंडस्ट्री खिल उठी और 1930 तक प्रति वर्ष 200 फिल्में बनाने लगी थी। ये वही दौर है जब निर्देशक अर्देशिर ईरानी ने महसूस किया कि फिल्ममेकिंग की प्रक्रिया में ध्वनि की बड़ी भूमिका होगी और ऐसे ही मिली भारतीय सिनेमा को पहले साउंड फिल्म “आलम आरा”।

alam ara poster
आलम आरा फिल्म का एक पोस्टर

आज जब इस ऐतिहासिक फिल्म को 88 साल पूरे हो चुके हैं, तो आइये जानते हैं फिल्म से जुड़े कुछ रोमांचक और दिलचस्प तथ्य-

  • फिल्म ना केवल पहली साउंड फिल्म थी बल्कि इस फिल्म के जरिये, भारतीय सिनेमा को पहले प्लेबैक गायक वजीर मोहम्मद खान भी मिले थे। पहले गाने का नाम-‘दे दे खुदा के नाम पे’ था और गानों वाली पहली फिल्म में पूरे आठ गाने थे।
  • फिल्म पहली बार मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा में रिलीज़ हुई थी। भले ही उस वक़्त सिनेमा हॉल में जाकर फिल्में देखना आदर्श नहीं माना जाता था, मगर जब “आलम आरा” रिलीज़ हुई तो सिनेमा हॉल में बहुत भारी भीड़ देखी गयी थी। फिल्म आठ महीने तक सफलतापूर्वक चली थी।
  • भारतीय थिएटर के शहंशाह पृथ्वीराज कपूर जिन्होंने उस वक़्त तक 9 मूक फिल्मों में काम कर लिया था, उन्होंने “आलम आरा” के जरिये पहले बोलती फिल्म से डेब्यू किया था।
  • पारसी नाटक ‘जोसफ डेविड’ पर आधारित, फिल्म अमेरिकी फिल्म ‘शो बोट’ (1929) से प्रेरित थी। दिलचस्प बात है कि “आलम आरा” में पूरे 78 अभिनेता थे जिन्होंने फिल्म के लिए पहले बार अपनी आवाज़ रिकॉर्ड की थी।
  • फिल्म की लोकप्रियता इतनी ज्यादा थी कि गूगल ने इस पर ध्यान दिया और इसकी 80वी सालगिरह पर 14 मार्च 2011 को डूडल समर्पित किया। उसके अगले साल भी, एक कैलेंडर रिलीज़ हुआ जिसमे कुछ पहली भारतीय फिल्म से जुड़े कुछ पोस्टर दिखाई दे रहे थे और उसमे “आलम आरा” भी शामिल थी।
  • भले ही अर्देशिर ईरानी निर्देशित फिल्म भारतीय सिनेमा के लिए एतिहासिक थी मगर इसकी आज एक भी कॉपी उपलब्ध नहीं है।

भले ही आज “आलम आरा” की एक भी कॉपी उपलब्ध ना हो मगर जो क्रांति ये भारतीय सिनेमा में लेकर आई है, नजाने कितने लोग इस कारण फिल्म के मेकर्स के कर्जदार होंगे और इसका महत्त्व सदा सिनेमाप्रेमियों के दिलों में रहेगा।

About the author

साक्षी बंसल

पत्रकारिता की छात्रा जिसे ख़बरों की दुनिया में रूचि है।

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