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आरबीआई और मोदी सरकार के बीच क्यों है तकरार?

केंद्र सरकार और आरबीआई

हाल में चल रही आरबीआई और केंद्र के बीच तकरार वैश्विक स्टार पर चर्चा का विषय बनी हुई है। कयास लगाए जा रहे हैं कि केंद्र आरबीआई पर अपना नियंत्रण चाहती है।

इसी बीच वित्त मंत्रालय और आरबीआई के बीच लगातार बढ़ती बयानबाज़ी से इन दोनों के बीच तकरार और भी तेज़ होती जा रही है। ऐसे में अनुमान है देश की आर्थिक नीति और मौद्रिक नीति के बीच संतुलन साधने में ख़ासी मशक्कत करनी पड़ सकती है।

इसी बीच खबर आ रही थी कि सरकार धारा 7 का प्रयोग करके आरबीआई के लिए नीतियों का गठन व वर्मन में चल रही नीतियों में बदलाव करना चाहती है। हालाँकि अभी तक न ही सरकार और न ही आरबीआई ने इसके संदर्भ में कोई बयान जारी किया है।

क्यों शुरू हुई है ये तकरार?

आरबीआई और केंद्र के बीच चल रही तकरार के कई पहलू है। सरल भाषा में कहें तो केंद्र सरकार के अधीन वित्त मंत्रालय देश में इस समय चल रहे तमाम तरह के वित्तीय संकट को अपने हिसाब से काबू में करना चाहता है, जबकि आरबीआई अपने काम करने के तरीके को बदलना नहीं चाहती है।

ऐसे में वित्त मंत्रालय चाहता है कि आरबीआई अपने कोष जिसमें 3.6 हज़ार अरब रुपये की मुद्रा है, इससे देश पे चढ़ा हुआ कर्ज़ उतारा जाये, लेकिन आरबीआई ने मंत्रालय की इस चाहत को सिरे से नकार दिया है।

इसी तरह से IL&FS की घटना के साथ ही आरबीआई ने नॉन बैंकिंग सेक्टर के लिए अपने नियमों को कडा करने का मन बनाया था, जबकि सरकार चाहती है कि आरबीआई नॉन बैंकिंग सेक्टर के लिए अपने रुख को नरम ही रखे।

वहीं आरबीआई ने हाल ही में अपने रेपो रेट को समान रखने की घोषणा की थी, जिसे लेकर बैंकिंग सेक्टर में प्रबल निराशा का माहौल उत्पन्न हो गया था। वहीं सरकार ने आरबीआई से सार्वजनिक क्षेत्र की 11 बैंकों को ऋण देने के नियमों को लचीला बनाने को कहा था, जबकि आरबीआई अपने नियमों में किसी भी तरह की ढील नहीं रखना चाहती है।

हालाँकि आरबीआई और केंद्र के बीच इस गर्मागर्मी के चलते निवेशकों के लिए एक जोखिम भरा माहौल तैयार हो गया है, जबकि निवेशक सरकार के साथ ही आरबीआई से भी बाज़ार को लेकर अपने रुख को नरम रखने की उम्मीद किए हुए हैं।

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