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आइंस्टाइन को “चुनौती” देने वाले सुदर्शन अब नहीं रहे

जॉर्ज सुदर्शन

इन्नाकल चंडी जॉर्ज सुदर्शन, भारतीय विज्ञान जगत के सबसे बड़े सितारों में से एक, अब हमारे बीच नहीं हैं। 14 मई यानी कल, अमेरिका के टेक्सस में 86 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गयी।

सुदर्शन भौतिकी के जाने माने वैज्ञानिक थे। उन्हें भौतिकी के क्षेत्र में असाधारण योगदान के लिए जाना जाता है। क्वांटम फिजिक्स व क्वांटम ऑप्टिक्स में उनका कार्य अभूतपूर्व था।

उनकी सबसे महत्वपूर्ण खोजो में से एक “टैकियोन” कणों ने आइंस्टाइन के इस सिद्धांत को चुनौती दी कि कोई भी वस्तु प्रकाश की गति से तेज नहीं चल सकती है।

जीवनी

सुदर्शन का जन्म 1931 में केरला के बल्लम में एक सीरियाई ईसाई परिवार में हुआ था। उन्होंने मद्रास क्रिश्चन कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की, व मद्रास विश्वविद्यालय से 1952 में स्नाकोत्तर की डिग्री प्राप्त की। कुछ समय उन्होंने टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में भी काम किया। वहां उनके सहकर्मियों में से एक होगी जहांगीर भाभा भी थे।

यहां से वह रोचेस्टर यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क गये। यहां उन्होंने रॉबर्ट मार्शक की देखरेख में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की।

वैज्ञानिक उपलब्धियां

ईसीजी सुदर्शन ने अपनी पीएचडी की अध्ययन अवधि  के दौरान ही कई महत्वपूर्ण शोध प्रकाशित किए। उन्होंने रॉबर्ट मार्शक के साथ मिलकर कमजोर परमाणु बल की खोज की। जिसे आग बढ़ाने के लिए रिचर्ड फेमन को नोबेल प्राइज भी मिला।

उन्होंने अविरुद्ध प्रकाश के लिए क्वांटम निरूपण भी तैयार किया था। जिसे सुदर्शन-ग्लॉबर निरूपण भी कहा जाता है। सुदर्शन विश्व के पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने टैकियोन कणों की थ्योरी को सामने रखा। टैकियोन ऐसे  कण हैं जो प्रकाश की गति से भी तेज चलते हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में योगदान

सुदर्शन का भारत में व विदेशों में भी शिक्षा के क्षेत्र में अहम योगदान रहा अपने जीवन के दौरान वह कई बड़े कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाने का मौका मिला। उन्होंने टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में भी अध्ययन शिक्षण संबंधी कार्य किया था।

वह टेक्सास यूनिवर्सिटी में भौतिकी के प्रोफेसर रह चुके हैं भारतीय विज्ञान संस्थान मैं वह वरिष्ठ पर प्रोफेसर के पद पर सेवा दे चुके हैं। उन्होंने 5 साल इंस्टिट्यूट ऑफ मैथमेटिकल साइंस के निदेशक के तौर पर भी काम किया। उनके कार्यकाल में इस संस्थान नई उपलब्धियां प्राप्त की।

नोबेल प्राइज का मलाल

ईसीजी सुदर्शन अपनी विद्वता व विज्ञान क्षेत्र में योगदान के लिए नोबेल प्राइज के हकदार थे। पर कई मौकों पर उन्हें नोबेल प्राइज के लिए नजरअंदाज कर दिया गया।

सबसे बड़ा मुद्दा 2005 में सामने आया जब “सुदर्शन-ग्लॉबर निरूपण” के लिए सुदर्शन को नजरअंदाज करके सिर्फ ग्लॉबर को नोबेल प्राइज दे दिया गया। इसके खिलाफ कई वैज्ञानिकों ने नोबेल कमेटी को पत्र लिखकर असंतोष जताया था।

कई अन्य मौकों पर भी सुदर्शन का नाम नोबल कमिटी को प्रस्तावित किया गया था, पर उन्हें नोबल पुरस्कार नहीं मिल पाया।

भारत व वेदांत से लगाव

सुदर्शन का जन्म एक ईसाई परिवार में हुआ था। पर अपनी सहपाठी मित्र से शादी करने के बाद वह इसे त्याग कर हिन्दू बन गए थे। हिन्दू धर्म की तरफ वो आकर्षित थे। उनका वेदों के ज्ञान के प्रति काफी उत्साह था। व वेदांत पर भी उन्होंने काफी कुछ लिखा था। वेदांत पर आयोजित समारोहों में भी उन्हें अक्सर देखा जाता था।

उनकी मृत्यु पूरे विश्व के वैज्ञानिक तथा शिक्षण जगत व खासकर हमारे देश के लिए एक बड़ी क्षति है।




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