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राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत नें नागरिकता क़ानून के खिलाफ विरोध में लिया भाग

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) ने शुक्रवार को मांग की कि केंद्र देश में शांति और सद्भाव बनाए रखने के लिए संशोधित नागरिकता कानून (CAA-NRC) को वापस ले।

उन्होंने जयपुर में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम या सीएए के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन के दौरान एक आश्चर्यजनक उपस्थिति दर्ज की, इस स्थान को राजस्थान का “शाहीन बाग” कहा जा रहा है।

गहलोत ने जयपुर में सीएए के विरोध में कहा, “एनडीए सरकार को नागरिकता (संशोधन) अधिनियम पर पुनर्विचार करना चाहिए, जो संविधान की भावना के खिलाफ है, और इसे वापस लेने के लिए आगे आना चाहिए ताकि शांति और सद्भाव बना रहे।”

श्री गहलोत ने कहा कि कांग्रेस और राज्य सरकार उनके साथ है और अगर जरूरत पड़ी तो वह नजरबंदी केंद्र में सबसे पहले जाएंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि माता-पिता के जन्मस्थान की जानकारी राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के लिए मांगी जा रही है।

उन्होनें आगे कहा, “देशभर में 300-400 जगह पर केन्द्र सरकार के विभाजनकारी निर्णयों के विरूद्ध धरने-प्रदर्शन और आंदोलन चल रहे हैं। अधिकांश राज्यों के मुख्यमंत्री कह चुके हैं कि सीएए और एनआरसी को लागू नहीं करेंगे। ऐसे में, केन्द्र सरकार को चाहिए कि वह स्वयं ही संविधान की मूल भावना को नष्ट करने वाले कानून और इससे जुड़ी प्रक्रियाओं को वापस ले लें।”

गहलोत नें आगे कहा, “आज देश में अराजकता और डर की स्थिति बनी हुई है। जनता भली-भांति समझती है कि सीएए और एनआरसी देश के संविधान के खिलाफ हैं। एनआरसी के लिए 76000 करोड़ रूपये खर्च करना और सारे देश की जनता को लाइनों में खड़ा करने का कोई अर्थ नहीं है। असम में एनआरसी की प्रक्रिया के दौरान गरीब लोगों को, जिसमें सभी धर्म-जातियों के लोग शामिल हैं, नागरिकता सूचियों में नाम दर्ज कराने में कितनी तकलीफें झेलनी पड़ी हैं। वहां एनआरसी के लिए 1600 करोड़ रूपए खर्च करने के बाद अब राज्य सरकार इसे लागू नहीं करना चाहती। जो कानून लागू नहीं हो सकता, उसके लिए कवायद क्यों की जा रही है।”

बयान में आगे कहा गया, “धरने में शामिल लोगों को आश्वस्त किया कि राज्य सरकार नागरिकों के बीच भेद करने वाले कानून सीएए और एनआरसी को लागू होने से रोकने के लिए हर आवश्यक कदम उठाएगी। इस विषय में केन्द्र सरकार को उचित जवाब दिया जाएगा। यह सही है कि श्री नरेन्द्र मोदी देश के चुने हुए प्रधानमंत्री हैं, लेकिन राज्यों में भी जनता के चुने हुए मुख्यमंत्री हैं। यदि राज्य विधानसभाओं के सदस्यों ने संकल्प पारित कर इन विभाजनकारी कानूनों के बारे में जनता की भावना से केन्द्र सरकार को अवगत कराया है, तो उन्हें इन पर पुनर्विचार करना चाहिए। लोकतंत्र में जनता का फैसला सर्वोपरि होता है और हमारे देश की जनता कब अपना निर्णय सुना दे, इसकी किसी को कानों-कान खबर नहीं होती।”

“जयपुर के ऐतिहासिक शांति मार्च में शामिल होने के लिए लोगों को धन्यवाद, 4-5 लाख लोग राष्ट्रीय तिरंगा झण्डा हाथ में लेकर मार्च में शामिल हुए और कोई भी नारा नहीं लगा। इस आयोजन के दौरान राजस्थान की जनता ने पूरे देश को यह संदेश दिया है कि हम सब हिन्दुस्तानी हैं और राष्ट्रभक्त हैं। केन्द्र सरकार में बैठे लोगों को यह समझना चाहिए कि जनभावना का आदर करके ही शासन किया जा सकता है,” गहलोत नें यह कहकर भाषण खत्म किया।

About the author

पंकज सिंह चौहान

पंकज दा इंडियन वायर के मुख्य संपादक हैं। वे राजनीति, व्यापार समेत कई क्षेत्रों के बारे में लिखते हैं।

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