महानायक अमिताभ बच्चन का राजनीतिक सफर और फिर संन्यास…

अमिताभ बच्चन
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अमिताभ बच्चन भारतीय सिनेमा में सहस्राब्दि महानायक के रूप में जाने जाते हैं। अ​मिताभ बच्चन 75 वर्ष की अवस्था में भी बॉलीवुड के सबसे नामी अभिनेताओं में शुमार किए जाते हैं। देश का ऐसा कोई भी शख्स नहीं होगा जो अमिताभ की संवाद अदायगी और उनके अभिनय का कायल नहीं होगा। आप को जानकारी के लिए बता दें अमिताभ बच्चन का पूरा नाम अमिताभ हरिवंश श्रीवास्तव है। इनका जन्म 11 अक्टूबर 1942 को इलाहाबाद में हुआ था। अमिताभ बच्चन के पिता का नाम हरिवंश राय बच्चन और माता का नाम तेजी बच्चन है।

अमिताभ बच्चन ने अपने फिल्मी करियर में तीन राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार और बारह फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड हासिल किए हैं। सर्वाधिक सर्वश्रेष्ठ अभिनेता फ़िल्मफेयर अवार्ड का रिकार्ड आज भी उनके नाम है। अमिताभ को 1984 में पद्मश्री, साल 2001 में पद्म भूषण एवं वर्ष 2015 में पद्मविभूषण पुरस्कार दिए गए।

इंकलाब से बने अमिताभ

अमिताभ के पिता हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि थे। बचपन में अमिताभ का नाम इंकलाब था, इसके पीछे भी एक बड़ी दिलचस्प कहानी है। दरअसल जब अमिताभ बच्चन पैदा हुए उस समय महात्मा गांधी 9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन की शुरूआत कर चुके थे।

इसी के ठीक दो दिन बाद ​अमिताभ का जन्म हुआ। अगस्त क्रांति से प्रेरित होकर हरिवंश राय बच्चन ने अपने बेटे का नाम इंकलाब रख दिया। कहते हैं जिस समय हरिवंश राय बच्चन और तेजी बच्चन नर्सिंग होम में थे तभी उनके प्रिय मित्र सुमित्रानंदन पंत वहां पहुंचे और कहा कि यह नवजात कितना शांत दिख रहा है, मानो ध्यानस्थ हो। इसके बाद हरिवंश राय बच्चन ने इंकलाब से नाम बदलकर अमिताभ रख दिया।

अमिताभ-राजीव

जब करनी पड़ी नौकरी

कहते हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में अध्ययन के दौरान ही महानायक अमिताभ बच्चन के मन में अभिनय की इच्छा जाग्रत हो चुकी थी, ऐसे में इन्होंने कालेज के दिनों से थियेटर करना शुरू कर दिया। कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के कुछ दिनों बाद अपनी जीविका चलाने के लिए अमिताभ बच्चन ने कोलकता की एक शिपिंग फर्म बर्ड एंड कंपनी में किराया ब्रोकर की नौकरी भी की।

एक बार अमिताभ बच्चन नौकरी के लिए आॅल इंडिया रेडियो भी गए थे, लेकिन उनकी आवाज को अनफिट करार दिया गया था, आज अमिताभ की आवाज के करोड़ों दीवाने हैं। जहां तक फिल्मों की बात है, यह कहना बिल्कुल लाजिमी है कि अमिताभ जहां खड़े हो जाते हैं, वहीं लाइन शुरू होती है।

अमिताभ बच्चन की संवाद अदायगी और फिल्मी सफरनामा इतना विस्तृत है कि उसे शब्दों में बयान करना इतना आसान नहीं है। लेकिन आप को जानकारी के लिए बता दें कि कुछ समय के लिए यह फिल्मी महानायक भारतीय राजनीति का चमकता सितारा बनकर उभरा था।

अमिताभ चुनाव प्रचार

राजनीति में अमिताभ की एंट्री

अमिताभ बच्चन और राजीव गांधी की दोस्ती जगजाहिर है। इन दोनों के बीच दोस्ती इतनी प्रगाढ़ थी कि कभी-कभी राजीव गांधी अमिताभ से मिलने फिल्म शूटिंग प्वाइंट पर भी पहुंच जाते थे। फिल्म ‘गंगा की सौगंध’ शूटिंग के दौरान भी राजीव अमिताभ से मिलने जयपुर आए थे।

कहते हैं राजीव गांधी ने ही अमिताभ को राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया था। आप को बता दें कि साल 1984 में अमिताभ बच्चन बतौर कांग्रेस उम्मीदवार इलाहाबाद लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे और भारी मतों से अपने प्रतिदंवदी को हराया। लेकिन बच्चन का राजनीतिक करियर बहुत छोटा रहा। मात्र 3 साल बाद ही अमिताभ बच्चन ने सांसद पद से इस्तीफा ही नहीं दिया बल्कि हमेशा-हमेशा के लिए राजनीति से संन्यास ले लिया।

अमिताभ बच्चन चुनाव के दौरान

चुनाव में यूपी के इस पूर्व मुख्यमंत्री को हराया

हेमवती नंदन बहुगुणा का नाम कांग्रेस के बड़े नेताओं में शामिल है। कांग्रेस से अपने करियर की शुरूआत करने वाले बहुगुणा 1952 से लगातार यूपी कांग्रेस क​मेटी के सदस्य रहे। बाद में हेमवती नंदन बहुगुणा 1974 में यूपी के मुख्यमंत्री भी बने। लेकिन 1977 लोकसभा चुनाव से पहले ही बहुगुणा ने कांग्रेस से बगावत कर दी, और जगजीवन राम के साथ मिलकर कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी नामक पार्टी बनाई।

1977 के चुनाव में इस पार्टी को 28 सीटें मिली थी। बाद में इस पार्टी का विलय जनता दल में कर लिया गया। 1977 की सरकार में हेमवती नंदन बहुगुणा देश के वित्त मंत्री भी बने। लेकिन अवसर पाकर 1980 में बहुगुणा कांग्रेस में दोबारा शामिल हो गए। 1980 के चुनाव में बहुगुणा ने गढ़वाल से जीत हासिल की लेकिन इन्हें कैबिनेट में जगह नहीं दी गई। इससे नाराज होकर बहुगुणा ने 6 महीने बाद ही कांग्रेस और लोकसभा से इस्तीफा दे दिया। 1982 में हुए उपचुनाव के दौरान इसी सीट से एक बार फिर बहुगुणा ने जीत दर्ज की।

लेकिन 1984 का लोकसभा चुनाव हेमवती नंदन बहुगुणा के लिए अशुभ साबित हुआ। इस चुनाव में बहुगुणा ने इलाहाबाद से पर्चा भरा लेकिन इनके खिलाफ कांग्रेस ने अमिताभ बच्चन को चुनाव मैदान में उतारा। उस दौरान लोग कहते थे कि बहुगुणा जैसे कद्दावर नेता के सामने अमिताभ को चुनाव लड़ाकर कांग्रेस भारी भूल कर रही है। क्योंकि अमिताभ बच्चन एक फिल्मी हीरो के अलावा कुछ भी नहीं थे।

1984 में यह चर्चा होने लगी थी कि अमिताभ बच्चन चुनाव हार जाएंगे लेकिन बच्चन ने हेमवती नंदन बहुगुणा को 1 लाख 87 हजार के रिकॉर्ड मतों से हराया। बहुगुणा को इस हार का इतना गहरा सदमा लगा कि उन्होंने कभी दोबारा चुनाव नहीं लड़ा और बाद में बहुगुणा ने राजनीति से सन्यास भी ले लिया।

अमिताभ चुनाव प्रचार इलाहाबाद1

मतगणना के दौरान सामने आया रोचक मामला

हेमवती नंदन बहुगुणा और अमिताभ बच्चन के बीच हुए रोचक मुकाबले के बाद मतगणना के दौरान एक बेहद दिलचस्प मामला देखने को मिला। दरअसल अमिताभ बच्चन को मिले 4000 वोट कैंसिल हुए थे, क्योंकि इलाहाबाद की महिला वोटर्स ने बैलेट पेपर पर मुहर की जगह लिपिस्टिक का ठप्पा लगा दिया था।

इलाहाबाद में अमिताभ को इतनी पॉपुलारिटी मिली कि रात दस बजे तक वोटिंग हुई थी, और सुबह साढ़े दस बजे पॉलिंग पार्टी बूथ से बॉक्स लेकर रवाना हुई थी। किसी-किसी पोलिंग बूथ पर 95 फीसदी से लेकर 100 फीसदी तक वोटिंग हुई थी। इसे लेकर चुनाव आयोग ने टिप्पणी की थी कि क्या इस वोटिंग के दौरान कोई बीमार नहीं पड़ा।

राजनीतिक सभाओं में अमिताभ के जुमले

यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के समर्थक चुनाव प्रचार के दौरान अ​मिताभ को नचनिया कहकर बुलाते थे। लेकिन जैसे ही अमिताभ और उनकी पत्नी जया भादुड़ी गली-मोहल्लों तथा चौराहों पर सभाएं करते इलाहाबाद की अवाम उमड़ पड़ती थी। महानायक अमिताभ सभाओं के दौरान हमेशा इलाहाबादी बोली में बात करते थे। अमिताभ ने बहुगुणा को हराने के लिए कहा था ‘मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है’।

चूंकि उनके प्रतिद्वंदी हेमवती नंदन बुहुगुणा उत्तराखंड से थे। वो कहते थे बहुगुणाजी काफी वरिष्ठ राजनेता है, इसलिए मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं, इसलिए उनके सामने कुछ भी नहीं बोलूंगा। अमिताभ बच्चन ने चुनाव के दौरान बहुगुणाजी का पैर छूकर जीत का आशीर्वाद भी मांगा था।

जीत के बाद अमिताभ बच्चन

राजनीति से अमिताभ का संन्यास

इलाहाबाद से सांसद बनने के बाद अमिताभ बच्चन को नई दिल्ली के मोतीलाल मार्ग स्थित बंगला नंबर 2एफ रहने को मिला था। अमिताभ बच्चन राजनीति के साथ फिल्में भी करने लगे थे। सांसद बनने के दौरान उनकी फिल्मों में मर्द मूवी ने काफी अच्छी कमाई की थी। अमिताभ फिल्मों में इतना मशगूल हो गए कि चुनाव जीतने के बाद अमिताभ अपने संसदीय क्षेत्र इलाहाबाद तक नहीं लौटे। इसका फायदा उनके विरोधियों ने उठाना शुरू कर दिया।

साल 1987 में राजीव गांधी के साथ बोफोर्स घोटाले में अमिताभ बच्चन का नाम भी घसीटा जाने लगा। इस दवाब से परेशान होकर अमिताभ ने राजनीति से सन्यास ले लिया। बोफोर्स घोटाले के मुद्दे ने इतना तूल पकड़ लिया कि 1989 में कांग्रेस पार्टी लोकसभा चुनाव हार गई। बोफोर्स घोटाले में जया बच्चन का मानना है कि राजीव गांधी चाहते तो अमिताभ की छवि बचा सकते थे। एक टेलीविजन चैनल को दिए इंटरव्यू में अमिताभ ने कहा था कि राजनीति में उतरना मेरी सबसे बड़ी भूल थी।

राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन

मैं केवल भावावेश में आकर इस क्षेत्र में उतर गया था। राजनीतिक अखाड़े की वास्तविकता का पता मुझे बाद में चला कि यह असल भावनाओं से कितनी अलग है। अमिताभ ने कहा कि अब मैं राजनीति छोड़ चुका हूं, इसलिए दोबारा राजनीति में जाने की बात सोच भी नहीं सकता।

इस अखबार के खिलाफ अमिताभ ने किया था मुकदमा

साल 1986 में भारत सरकार ने स्वीडन कंपनी बोफोर्स से तोपें खरीदीं। साल 1987 में स्वीडन में रेडिया पर एक खबर प्रसारित की गई कि इस सौदे में कुछ लोगों ने दलाली की है। इसके बाद जैसे ही यह खबर भारतीय मीडिया में आग की तरह फैली, कांग्रेस सरकार हिल गई थी। बोफार्स तोप घोटाले में शामिल लोगों में राजीव गांधी के साथ अमिताभ बच्चन का नाम भी सामने आया।

एक स्वीडिश अखबार द्वारा बोफोर्स घोटाले में अमिताभ का नाम घसीटने के खिलाफ उन्होंने लंदन के कोर्ट में तथाकथित अखबार के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था और केस भी जीत गए। बावजूद इसके अमिताभ बच्चन का नाम बोफोर्स घोटाले से जुड़ता रहा।