रविवार, मार्च 29, 2020

अखिलेश के खिलाफ मुलायम को मोहरा बना सियासी चालें चल रहे हैं शिवपाल

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हिमांशु पांडेय
हिमांशु पाण्डेय दा इंडियन वायर के हिंदी संस्करण पर राजनीति संपादक की भूमिका में कार्यरत है। भारत की राजनीति के केंद्र बिंदु माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु भारत की राजनीतिक उठापटक से पूर्णतया वाकिफ है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद, राजनीति और लेखन में उनके रुझान ने उन्हें पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया। हिमांशु दा इंडियन वायर के माध्यम से ताजातरीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने विचारों को आम जन तक पहुंचाते हैं।

सपा के अंदर चल रही अन्तर्कलह से आज पूरा देश वाकिफ है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पूर्व देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार में मचे घमासान का असर विधानसभा चुनावों के परिणाम पर भी दिखा और सत्ताधारी दल सपा 47 सीटों पर सिमट कर रह गई। भाजपा प्रचण्ड बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता में आई और योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ। सपा के दो फाड़ हो गए और अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव अलग-अलग राहों की ओर मुड़ गए। अखिलेश यादव के साथ उनके चाचा रामगोपाल यादव थे वहीं मुलायम सिंह यादव के गुट में उनके भाई और सपा के संस्थापक सदस्य शिवपाल सिंह यादव थे। सपा में हुए बिखराव के बाद से ही अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव के बीच जंग जारी है और शिवपाल सिंह यादव नेताजी को अखिलेश के खिलाफ सियासी चालें चलने के लिए मोहरा बना रहे हैं।

अखिलेश ने काटा था शिवपाल का पत्ता

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से ठीक पहले सपा में जबरदस्त आन्तरिक फूट देखने को मिली। 1 जनवरी, 2017 को रामगोपाल यादव ने सपा का राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाकर अखिलेश यादव को सपा अध्यक्ष घोषित कर दिया। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने इस अधिवेशन को अवैध बताया और रामगोपाल यादव को 6 साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया। पिछले 6 महीनों के दौरान यह तीसरा मौका था जब सपा से रामगोपाल यादव को निष्कासित किया गया था। इसके बाद उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और उन्हें मंत्री पद से हटाकर पार्टी से भी बर्खास्त कर दिया। सपा की इस आपसी खींचतान का असर पारिवारिक रिश्तों पर भी पड़ा और अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव में दूरियां बढ़ती गई।

पार्टी आयोजनों से दूर है मुलायम-शिवपाल

सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव और शिवपाल सिंह यादव पिछले कुछ महीनों से पार्टी आयोजनों से दूर रह रहे हैं। इसका मुख्य कारण अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के बीच चल रहे राजनीतिक मतभेद हैं। शिवपाल सिंह यादव भी कई बार यह बात कह चुके हैं कि नेताजी का अपमान अब और बर्दाश्त नहीं लिया जाएगा। अखिलेश यादव ने सपा अध्यक्ष बनने के बाद शिवपाल सिंह यादव के समर्थकों को किनारे लगाना शुरू कर दिया था और आज पूरी सपा में अखिलेश समर्थक भरे पड़े हैं। शिवपाल सिंह यादव अपने समर्थकों और नेताजी के नेतृत्व के भरोसे हैं। हाल के कुछ वक्त में शिवपाल सिंह यादव का प्रभुत्व मुलायम सिंह यादव के गुट में बढ़ा है पर सपा संगठन अखिलेश यादव को नेताजी का उत्तराधिकारी मान चुका है। ऐसे में यह कहना मुश्किल है शिवपाल-मुलायम की यह जोड़ी रंग जमा पाएगी या नहीं।

लोहिया ट्रस्ट में कायम है शिवपाल का दबदबा

अभी हाल ही में लखनऊ में हुई लोहिया ट्रस्ट की बैठक का अखिलेश गुट ने बहिष्कार किया था। मुलायम सिंह यादव द्वारा बुलाई गई इस बैठक में शिवपाल सिंह यादव और उनके समर्थकों ने हिस्सा लिया वहीं अखिलेश यादव और उनके समर्थक बैठक से नदारद दिखे। लोहिया ट्रस्ट की इस बैठक में मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव के तथाकथित सलाहकार और उनके चाचा रामगोपाल यादव को ट्रस्ट सचिव के पद से बर्खास्त कर दिया गया और उनकी जगह शिवपाल सिंह यादव को नया सचिव नियुक्त किया। अखिलेश गुट के 4 सदस्यों को लोहिया ट्रस्ट से निष्कासित कर दिया गया। उनकी जगह शिवपाल गुट के 4 लोगों को ट्रस्ट का सदस्य बनाया गया। निष्कासित सदस्यों में रामगोविंद चौधरी, उषा वर्मा, अहमद हसन और अशोक शाक्य के नाम शामिल थे वहीं नवनिर्वाचित सदस्यों में दीपक मिश्रा, राम नरेश यादव, राम सेवक यादव और राजेश यादव के नाम शामिल थे।

मजबूत नेता बनकर उभर रहे हैं अखिलेश

जब से सपा में बिखराव हुआ है अखिलेश यादव बतौर नेता मजबूत होकर उभरे हैं। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार के कार्यकाल के दौरान सरकार के कामकाज और निर्णयों में मुलायम सिंह यादव और शिवपाल सिंह यादव का सीधा दखल था और इसे स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था। अखिलेश यादव को मुलायम सिंह यादव के उत्तराधिकारी के तौर पर सपा के सभी वरिष्ठ नेता स्वीकार चुके हैं। अगले महीने आगरा में होने वाले समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन के माध्यम से अखिलेश यादव एक बार फिर सपा में अपनी बादशाहत का प्रदर्शन करना चाहते हैं। आजम खान, रामगोपाल यादव, रामगोविंद चौधरी, नरेश अग्रवाल और किरण नंदा समेत तकरीबन सभी वरिष्ठ सपाई अखिलेश यादव को अपने नेतृत्वकर्ता के तौर पर स्वीकार चुके हैं और उत्तर प्रदेश का यादव समाज भी उन्हें अपना नेता मानता है। ऐसे में अखिलेश के वर्चस्व को टक्कर दे पाना शिवपाल सिंह यादव के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा।

नई पार्टी के गठन की अफवाहों को मुलायम सिंह यादव ने नकारा

सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव ने आज लखनऊ के लोहिया ट्रस्ट में कॉन्फ्रेंस बुलाई थी। उन्होंने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके शिवपाल सिंह यादव के साथ मिलकर नई पार्टी के गठन की खबरों को महज अफवाह बताते हुए कहा कि उनकी फिलहाल ऐसी कोई मंशा नहीं है। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में सपा के कई दिग्गजों का जमावड़ा था पर शिवपाल सिंह यादव यहाँ से नदारद दिखे। मुलायम सिंह यादव ने कहा कि अखिलेश यादव उनके पुत्र हैं और एक पिता होने के नाते मेरा आशीर्वाद हमेशा उनके साथ है। लेकिन मैं उनके फैसलों पर उनके साथ नहीं हूँ। हालाँकि उन्होंने यह नहीं बताया कि वह अखिलेश यादव के किस निर्णय की बात कर रहे थे पर कयास लगाए जा रहे हैं कि उनका इशारा अखिलेश यादव के सपा प्रमुख बनने की तरफ था।

आगे नेताजी ने कहा कि अखिलेश ने कहा था कि वह 3 महीने तक सपा अध्यक्ष बने रहेंगे और उसके बाद अध्यक्ष पद वापस कर देंगे । लेकिन अखिलेश ने अपनी जबान तक नहीं रखी और और अध्यक्ष पद के साथ-साथ पार्टी पर भी कब्जा जमा लिया। उन्होंने कहा कि जो इंसान अपने पिता का नहीं हो सकता वह किसी का नहीं हो सकता और कभी सफल नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि हम दोनों बाप-बेटे हैं और हमारे बीच मतभेद और कितने दिन रहेगा यह कोई नहीं कह सकता। हालाँकि सपा में जारी चाचा-भतीजे की लड़ाई पर उन्होंने अपना पक्ष नहीं रखा और प्रत्यक्ष रूप से यह नहीं कहा कि वह किसके साथ हैं। उन्होंने कहा कि वह किसी व्यक्ति विशेष के साथ नहीं बल्कि समाजवादी विचारधारा और समाजवादी पार्टी के साथ हैं।

संगठन में पकड़ और नेताजी के कन्धों पर टिकी है शिवपाल की सियासत

शिवपाल सिंह यादव समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और सपा में शुरुआत से ही नंबर दो की भूमिका में रहे हैं। उन्हें पार्टी संगठन में काम करने का लम्बा अनुभव है और सपा में उनकी साख के चलते उन्हें नेताजी का दायाँ हाथ भी कहा जाता है। पिछले काफी समय से शिवपाल मुलायम सिंह यादव को आगे करके अखिलेश यादव पर दबाव बना रहे हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में सपा की करारी हार के बाद से ही शिवपाल सिंह यादव लगातार कहते रहे हैं कि सपा की कमान नेताजी के हाथों में सौंप देनी चाहिए। उन्होंने बीते दिनों कन्नौज में कहा था कि नेताजी का और अपमान अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अगर शिवपाल सिंह यादव नेताजी के साथ मिलकर नई पार्टी का गठन कर भी लेते हैं तो उसे कितनी सफलता मिलेगी यह बताना मुश्किल है। मुलायम सिंह यादव अब वृद्ध हो चले हैं और अखिलेश यादव की लोकप्रियता युवाओं में बढ़ती जा रही है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि शिवपाल की सियासत का अगला दांव क्या होता है और नेताजी कितनी दूर तक उनका साथ देते हैं?

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