Wed. Nov 30th, 2022
    अखिलेश यादव

    कुछ वक़्त पहले तक देश की राजनीति में सब-कुछ ठीक चल रहा था। भाजपा सत्ता पर काबिज थी और कोई भी दल मुख्य विपक्षी नहीं था। बिहार में मिली सफलता के बाद केंद्र में भी मोदी लहर के खिलाफ ‘महागठबंधन’ के आसार नजर आ रहे थे। बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू नेता नीतीश कुमार को महागठबंधन के चेहरे के तौर पर पेश किया जा रहा था। वह नरेंद्र मोदी के विरोधियों में से एक थे और उनके खिलाफ विपक्ष का सबसे मजबूत और राष्ट्रीय पहचान वाला चेहरा भी। कहते है शतरंज और सियासत में बाजी पलटते देर नहीं लगती। कुछ ऐसा ही वाक़या देखने को मिला जब नीतीश कुमार ने महागठबंधन से किनारा कर भाजपा का दामन थाम लिया और पुनः जेडीयू-भाजपा गठबंधन की सरकार बना ली। अब विपक्ष के चेहरे बिना देश का सियासी पटल फिर सूना पड़ गया था और विपक्ष का ‘मिशन-2019’ खतरे में नजर आ रहा था। अन्य विकल्पों के रूप में मौजूद किसी भी नेता की राष्ट्रीय पहचान और लोकप्रियता नहीं थी। ऐसे में देश की राजनीति की धूरी कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश के क्षत्रप और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने आज 9 अगस्त को ‘मोदी-योगी’ सरकार के खिलाफ ‘देश बचाओ-देश बनाओ’ अभियान का आगाज किया किया। अखिलेश को अच्छी तरह पता है कि देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश का कितना प्रभुत्व है और ऐसे में वह ‘अगस्त क्रांति’ के बहाने सूबे में अपनी जड़ें तलाश रहे हैं। वह इस तथ्य से भी वाक़िफ़ हैं कि अगर उनकी ‘साईकल रैली’ की तरह यह अभियान सफल रहा तो वह केंद्र में विपक्ष के चेहरे बिना सूने पड़े सियासी पटल पर छा जायेंगे।

    राम नाम ही सांचा

    अखिलेश यादव के इस ‘देश बचाओ-देश बनाओ’ अभियान के तहत सपा कार्यकर्ता अपने-अपने जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन करने उतरे हैं वहीं अखिलेश यादव ने भाजपा का दांव चलते हुए खुद फैजाबाद जाकर अभियान की शुरुआत की। बता दें कि फैजाबाद जिले के अंतर्गत ही राम जन्मभूमि अयोध्या आती है और हर चुनाव में भाजपा ने इसे अहम मुद्दा बनाया है। सूबे के मुख्यमंत्री अपने शपथ ग्रहण के बाद दो बार यहाँ आ चुके हैं और अपने पहले बजट में उन्होंने इस धार्मिक नगरी के विकास के भारी-भरकम मद की घोषणा की थी। अभी तक सपा को यादव-मुस्लिमों की पार्टी कहा जा रहा है और यही दांव इस बार उसपर उल्टा पड़ गया था। सवर्णों के समर्थन बिना उत्तर प्रदेश में कोई दल जीत नहीं सकता और अखिलेश इस बात से अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं। इसीलिए अखिलेश चाहते है कि सपा की छवि में सुधार हो और वह सवर्णों का भरोसा भी जीते। सूबे में राजनीति के लिए ‘राम नाम ही सांचा’ है और शायद यही जानकर अखिलेश ने अपने अभियान का ‘श्रीगणेश’ राम के दरबार से किया है।

    ‘साईकल रैली’ जैसे करिश्मे की उम्मीद

    अखिलेश यादव ने 2012 में हुए विधानसभा चुनावों के वक़्त प्रदेश भर में ‘साईकल रैली’ निकाली थी और साईकल से हजारों किलोमीटर का सफर तय किया था। अखिलेश की टक्कर तब कांग्रेस के ‘युवराज’ राहुल गाँधी की ‘दलित के घर रोटी’ अभियान से थी। अखिलेश ने तब समाजवाद की लहर और अपने करिश्माई व्यक्तित्व के दम पर अपार जनसमर्थन हासिल किया था और बहुमत से सत्ता पर काबिज बसपा को जड़ से उखाड़ फेंका था। देश में तभी से उनके चर्चे होने लगे थे और उन्होंने प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी। अखिलेश यादव की लोकप्रियता भी युवाओं में है और युवाओं को उनकी योजनाओं का लाभ भी मिला था। उनके कार्यकाल में आयी योजनाओं से जनता में नाराजगी नहीं थी बल्कि बढ़ती अराजकता और गुंडाराज से जनता त्रस्त हो चुकी थी। मुख्यमंत्री तो अखिलेश थे पर सरकार को तीन अन्य लोग भी नियंत्रित करते थे। हालिया विधानसभा चुनावों से पहले अखिलेश यादव ने बगावती सुर छेड़े और सपा दो धड़ों में विभाजित हो गई। यह पार्टी की हार का कारण बना पर अखिलेश की छवि सुधर गई। अगर ‘देश बचाओ-देश बनाओ’ अभियान को भी साईकल रैली जैसा ही जनसमर्थन हासिल होता है तो यह निश्चित तौर पर विपक्ष में अखिलेश की भूमिका को मजबूत करेगा।

    पार्टी को सुधारने की कोशिश

    अखिलेश यादव ने सपा अध्यक्ष बनने के बाद से ही पार्टी की छवि सुधारने की कोशिश शुरू कर दी। पहले उन्होंने अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव को किनारे किया और फिर एक-एक कर के आपराधिक और भ्रष्ट छवि वाले नेताओं को हाशिए पर भेजना शुरू किया। उनके इस सख्त रवैये से खुद उनके पिता और पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह यादव भी नहीं बच सके और पार्टी में उनका प्रभाव और भूमिका भी सीमित होकर रह गई। अखिलेश को इस वजह से पार्टी में ‘टीपू सुल्तान’ की उपाधि भी दी गई। हालिया राष्ट्रपति चुनावों में भी सपा में दो फाड़ देखने को मिले जब नेताजी मुलायम सिंह यादव और शिवपाल ने रामनाथ कोविंद के पक्ष में मतदान किया। अखिलेश पार्टी में अनुशासन का स्तर बनाये रखने के लिए जी-तोड़ प्रयास कर रहे हैं।

    विपक्ष से मजबूत हैं रिश्ते

    हालिया विधानसभा चुनावों में अखिलेश यादव ने राहुल गाँधी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। हालांकि भाजपा को रोकने के लिए यह गठजोड़ नाकाफी साबित हुआ था पर आज भी वह साथी बने हुए हैं। उत्तर प्रदेश की एक अन्य प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी बसपा भी इन प्रदेश में जनाधार खो चुकी है। दलित और पिछड़ों की राजनीति करने वाली इस पार्टी की एक वक़्त में प्रदेश में बड़ी धाक थी। हालिया विधानसभा चुनावों में यह 80 से सिमट कर 19 सीटों पर रह गई। सपा भी 232 से 47 सीटों पर आ सिमटी थी। बसपा सुप्रीमो मायावती और मुलायम सिंह यादव धुर विरोधी थे पर अखिलेश यादव ने स्पष्ट कहा है कि भाजपा को रोकने के लिए उन्हें बसपा के साथ जाने में भी कोई दिक्कत नहीं है। दोनों को यह पता है कि अकेले दम पर वह भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकते हैं। राहुल गाँधी निश्चित रूप से देश की सबसे पुरानी पार्टी के ‘युवराज’ है पर यह बात उन्हें भी पता है कि उनके चेहरे पर विपक्ष मोदी को कोई टक्कर नहीं दे सकता। अपने बयान में उन्होंने कहा भी था कि वो अखिलेश यादव को विपक्ष के चेहरे के तौर पर आगे कर सकते हैं। ऐसे में इन तीनों पार्टियों का गठजोड़ 2019 में उत्तर प्रदेश और देश का राजनीतिक परिदृश्य बदल सकता है।

    राष्ट्रवाद को बनाया धूरी

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में ‘मन की बात’ में इस बात का जिक्र किया था कि अगस्त क्रांति का महीना है। 1 अगस्त को ‘असहयोग’ आन्दोलन शुरू हुआ था वहीं 9 अगस्त को ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन। 15 अगस्त को देश को आजादी मिली थी। ‘अगस्त क्रांति’ को ही आधार बनाकर अखिलेश ने ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन की 75वीं वर्षगांठ पर आज ‘देश बचाओ-देश बनाओ’ अभियान शुरू कर इसे राष्ट्रवाद से जोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि पिछले तीन वर्षों में भाजपा सरकार ने उसके खिलाफ उठाने वाली असहमति को असंवैधानिक और अनैतिक तरीके से दबाया है। मुमकिन है अखिलेश यादव की यह रणनीति कारगर साबित हो जाए और उनके इस अभियान को ‘भाजपा हटाओ-देश बचाओ’ या ‘दूसरी आजादी’ का नाम मिल जाए।

    पर इन सबके बाद भी सवाल यही उठता है कि क्या विपक्ष अखिलेश के चेहरे पर एकमत होगा? और अगर ऐसा होता भी है तो क्या अखिलेश, जो अपने परिवार को साथ नहीं रख पाए थे, इतनी अलग विचारधाराओं वाले विपक्ष को साथ रख पाएंगे? अगर अखिलेश विपक्ष को एक सूत्र में बांधने में कामयाब रहे भी तो क्या देश एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में सत्ता सौंपेगा जो एक प्रदेश में बहुमत से बनी सरकार का मुखिया होकर भी नियंत्रण अपने हाथ में नहीं रख सका था?

    By हिमांशु पांडेय

    हिमांशु पाण्डेय दा इंडियन वायर के हिंदी संस्करण पर राजनीति संपादक की भूमिका में कार्यरत है। भारत की राजनीति के केंद्र बिंदु माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु भारत की राजनीतिक उठापटक से पूर्णतया वाकिफ है।मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद, राजनीति और लेखन में उनके रुझान ने उन्हें पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया। हिमांशु दा इंडियन वायर के माध्यम से ताजातरीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने विचारों को आम जन तक पहुंचाते हैं।