पेरिस समझौते को लागू करना अमेरिका की वजह से होगा मुश्किल

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ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ने से चिंतित जलवायु वार्ताकारों ने बॉन ने सम्मेलन का आयोजन किया है। यहां पर चर्चा का मुख्य विषय रहेगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पेरिस समझौते के अलग होने के कारण इसे लागू करना कितना मुश्किल हो जाएगा। ट्रंप ने कुछ समय पहले कहा था कि वे पेरिस समझौते से अमेरिका को अलग रखेंगे।

सम्मेलन में शामिल होने वाले जलवायु वार्ताकार ट्रंप के फैसले से जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण का काम और मुश्किल होने को लेकर आशंकित हैं। दरअसल पेरिस समझौते पर अमेरिकी प्रशासन के रूख में कोई बदलाव नहीं आया है। वहीं अन्य देश इसे लागू करने के लिए पूरी तरह से समर्पित है।

अमेरिका की वजह से पेरिस समझौते में होगी दिक्कत

फिजी के प्रधानमंत्री फ्रैंक बाइनीमरामा ने एक बयान में कहा कि हमें पेरिस समझौते में निर्णयात्मक कदम के लिए वैश्विक सहमति बनाए रखनी चाहिए। वह 12 दिवसीय सम्मेलन की अध्यक्षता करेंगे।

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के चलते लोगों को तूफान, जंगल की आग, सूखा, बाढ़ और खाद्य सुरक्षा के खतरे का सामना करना पड़ रहा है।इस सम्मेलन में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल के हिस्सा लेने की संभावना है।

लेकिन जलवायु परिवर्तन के इस सम्मेलन में अमेरिका बड़े स्तर में शामिल नहीं होगा। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने कहा कि हम इसमें शामिल होंगे, लेकिन पेरिस समझौते के प्रति ट्रंप प्रशासन के रुख में बदलाव नहीं होगा। यानि की साफ है कि ट्रंप ने पेरिस समझौते को लेकर खुद को अलग करने के निर्णय पर कोई बदलाव नहीं किया है।

पेरिस समझौते में वर्ष 2015 में हस्ताक्षर किए गए थे और इसमें ग्लोबल वार्मिंग पर लगाम लगाने के लिए वैश्विक तापमान में दो डिग्री सेल्सियस तक कमी लाने और अगर संभव हो तो 1.5 डिग्री सेल्सियस तक कमी लाने का आह्वान किया गया था।

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