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तीन तलाक़ के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

तीन तलाक बिल
ट्रिपल तलाक़ भारत में लागु एक ऐसी तलाक़ की विधि है, जिसके जरिये कोई भी मुस्लिम पति सिर्फ तीन बार तलाक़ कहकर अपनी पत्नी को तलाक़ दे सकता है।

ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने आज फैसला किया है, कि इस मुद्दे को 6 महीने के लिए होल्ड पर रखा जाए। इस दौरान कोर्ट ने सरकार को यह आदेश दिया है, कि वो इसपर कोई सख्त कानून बनाये।

कोर्ट ने फैसले के दौरान कहा कि ट्रिपल तलाक किसी भी तरह सविंधान के खिलाफ नहीं है। और इसके लिए केंद्र सरकार को संसद में इसके खिलाफ कोई क़ानून लाना होगा। इसके लिए सरकार को 6 महीने का वक़्त दिया है।

क्या है ट्रिपल तलाक़ (तीन तलाक़) :

ट्रिपल तलाक़ भारत में लागु एक ऐसी तलाक़ की विधि है, जिसके जरिये कोई भी मुस्लिम पति सिर्फ तीन बार तलाक़ कहकर अपनी पत्नी को तलाक़ दे सकता है। इसके जरिये पति को तलाक़ का कारण बताने की भी जरूरत नहीं है। पति तलाक़ की घोषणा लिखकर, बोलकर या और किसी तरह भी कर सकता है। आज के दौर पर तो फोन पर मैसेज करके भी मुस्लिम पत्नी को तलाक़ दिया जा सकता है।

इस प्रथा को समय समय पर कई महिलाओं और पुरुषों ने चुनौती दी है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक फैसले में कहा गया था कि कुछ पुरानी प्रथाओं को बदलने की जरूरत है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि बहुत से मुस्लिम देशों जैसे सऊदी अरब, पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि में इस प्रथा पर रोक लगी है। 13 मई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़ के मुद्दे को तलाक़ की सबसे बुरी प्रणाली बताया। इससे पहले 8 दिसंबर 2016 को अलाहाबाद हाई कोर्ट ने तीन तलाक़ को संविधान के खिलाफ और मुस्लिम महिलाओं के लिए शाप बताया था।

हालाँकि कुछ मुस्लिम समुदाय जैसे आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तीन तलाक़ के मुद्दे को सही ठहराते हैं। ऐसे लोग तीन तलाक़ को शरीयत का हिस्सा बताते हैं। इनका कहना है कि इस प्रथा की वजह से मुस्लिम लोगों में बाकी धर्मों के लोगों के बजाय कम तलाक़ होते हैं।

 

About the author

पंकज सिंह चौहान

पंकज दा इंडियन वायर के मुख्य संपादक हैं। वे राजनीति, व्यापार समेत कई क्षेत्रों के बारे में लिखते हैं।




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