शुक्रवार, जनवरी 24, 2020

गुजरात विधानसभा चुनाव: रजवाड़ों को बंदर कहकर बुरे फंसे परेश रावल

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चुनाव के वक्त शब्दों की अपनी महत्वता होती है। मंच से उच्चारण किए गए शब्द चुनावी अग्नि में डाली गयी वो आहुति होते है जो सत्तारूपी यज्ञ को सफल और असफल बनाते है। एक लोकतान्त्रिक देश होने के नाते हर किसी को अपनी मनपसंद पार्टी को चुनने या उसकी आलोचना करने का पूरा हक है लेकिन बोलते वक्त लोगों को यह ख्याल जरूर रखना चाहिए कि हमारे संविधान में शब्दों की आजादी ही शब्दों की गरिमा तय करती है।

शब्दों की गरिमा भंग होने की स्थिति में शब्दों की आजादी पर सवाल उठने लगते है। यह सवाल कानूनी रूप से बाद में पहले सामाजिक रूप से उठते है। राजनेता बोलते वक्त शब्दों के चयन में उचित शिस्टाचार का पालन करे इसके लिए चुनाव आयोग ने बाकायदा सभी पार्टियों को लिखित में निर्देश भी दिए है।

गौरतलब है कि इस चुनाव में किसी राजेनता पर निजी हमले करने तथा उनको गलत नाम या गलत पद से संबोधित करने जैसी हरकतों पर चुनाव आयोग ने प्रतिबन्ध लगा दिया है लेकिन राजनेता है कि ना कुछ सुनने को तैयार है और ना कुछ देखने को तैयार है। बार बार मना करने के बाद भी वो मंच से ऐसे ऐसे शब्दों का उपयोग कर रहे है जिससे ना सिर्फ मंच की मर्यादा बल्कि लोकतान्त्रिक चुनाव की मर्यादा भी भंग हो रहीं है।

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए है जब राहुल गांधी को ‘पप्पू’ जैसे शब्दों से संबोधित करने पर चुनाव आयोग ने सभी दलों को फटकारा था लेकिन उसके बावजूद राजनेता है कि तस से मस नहीं हो रहें है। अब ताजा मामले में बॉलीवुड के जानेमाने कलाकार तथा बीजेपी सांसद परेश रावल अपने एक बयान के कारण मुश्किलों में पड़ गए है।

दरअसल शनिवार रात भाजपा के चुनाव कार्यालय के उद्घाटन के दौरान अपने संबोधन में परेश रावल ने रजवाड़ों की तुलना बंदरों से कर दिया था। रावल ने कहा था कि ”सरदार पटेल ने देश को एक करने के लिए बंदर जैसे रजवाड़ों को एक कर दिया था।” उनके इस बयान के बाद पहले से ही फिल्म पद्मावती के विरोध में देशभर में रोषप्रदर्शन करने वाली राजपूत करनी सेना नाराज हो गयी। देश के कोने कोने से लोगों ने परेश के इस बयान का विरोध करना शुरू कर दिया। विवाद को गरमाता देख परेश ने बिना देर किए संवाददाता सम्मेलन बुला कर स्पष्टीकरण दे दिया।

अपने स्पष्टीकरण में उन्होनें कहा कि वो राजपूतों का बहुत सम्मान करते है और इस बहादुर समाज के बारे में कुछ गलत कहने का सोच भी नहीं सकते। राजपूतों को देश का गौरव बताते हुए परेश ने सफाई दिया कि उनका बयान राजपूतों के लिए नहीं बल्कि बंदर की तरह उछल कर पाकिस्तान की गोद में बैठ जाने वाले हैदराबाद के निजाम के लिए था।

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