शुक्रवार, फ़रवरी 28, 2020

उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव : मुजफ्फरनगर में कैसे पार लगेगी भाजपा की नैया?

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उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में पहले चरण के चुनाव समाप्त हो चुके हैं। आज प्रदेशभर में दूसरे चरण के चुनावों के लिए मतदान हो रहा है। मुजफ्फरनगर जिले की दो नगर पालिकाओं और आठ नगर पंचायतों में चुस्त प्रशासनिक व्यवस्था और कड़ी सुरक्षा के बीच मतदान शुरू हो चुका है। दस निकायों के लिए 156 मतदान केंद्रों पर 549 बूथ बनाये गए है। मुजफ्फरनगर निकाय चुनाव को लेकर सभी पार्टियां एक दूसरे की आलोचना करती दिख रही है। मुजफ्फरनगर के वर्तमान नगर पालिका अध्यक्ष पंकज अग्रवाल है जो कांग्रेस के नेता है।

सूबे में दंगा-अपराध के लिए चर्चित रहने के कारण मुजफ्फरनगर को संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। इसको लेकर प्रदेश सरकार के आला अफसरों ने यहाँ डेरा डाल लिया है। अखिलेश सरकार में प्रमुख गृह सचिव रहे देवाशीष पांडा को योगी सरकार ने पर्यवेक्षक के रूप में तैनात किया है। वृहस्पतिवार को देवाशीष पांडा ने अफसरों के साथ चुनावी तैयारियों का जायजा लेने के साथ संवेदनशील गाँवों और क्षेत्रों की जानकारी ली।

आपको बता दें कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सबसे पहले निकाय चुनाव का प्रचार-प्रसार मुजफ्फरनगर से करने वाले थे। लेकिन किसी कारणवश उन्होंने अयोध्या से अपना चुनाव प्रचार शुरू किया था। निकाय चुनाव का प्रचार 14 नंवबर को योगी ने अयोध्या से आरंभ किया था। योगी मुजफ्फरनगर को चुनाव का एक अहम हिस्सा मानते है। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को स्थानीय जगहों पर प्रचार करने और लोगों से संपर्क करने के निर्देश दिए है। लेकिन देखा जाए तो मथुरा, आगरा के साथ-साथ भाजपा मुजफ्फरनगर में भी अपने आप को मजबूत मानती है। बीजेपी ने लोकसभा और विधानसभा सीटें अपने नाम कर ली है और अब नगर पालिका अध्यक्ष की सीट अपने नाम करना चाहती है। इसके लिए भाजपा के आला अधिकारी समेत कार्यकर्त्ता पार्टी के लिए कड़ी मेहनत कर रहे है।

भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में संजीव बाल्यान को चुनाव में उतरा था जिनकी लड़ाई बहुजन समाजवादी पार्टी के नेता कदीर राणा से थी। चुनाव परिणाम भाजपा के पक्ष में आया था। लेकिन कुछ पार्टियों का कहना है कि भाजपा ने मुजफ्फरनगर में मोदी के सहारे अपने नाव को किनारे लगाया था। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में यह स्पष्ट हो गया था कि भाजपा क्षेत्र में अपनी पकड़ और लोकप्रियता के कारण चुनाव जीती है। मुजफ्फरनगर में भाजपा ने चार विधानसभा सीटें जीती है, जिसमें मुजफ्फरनगर से कपिल देव अग्रवाल ने समाजवादी पार्टी के गौरव स्वरुप बंसल को हराया। इससे यह जाहिर हो गया है कि पार्टी अपने दम पर चुनावी नतीजे पेश कर रही है।

जानकारों का मानना है कि मुजफ्फरनगर निकाय चुनाव में इस बार भाजपा को कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। इसका कारण है मायावती की पार्टी का चुनाव में आगमन। राजनीतिकारों की माने तो मुजफ्फरनगर में लगभग 2,20,000 दलित और पिछड़ा वर्ग की आबादी है। यह आबादी बसपा का मजबूत वोटबैंक मानी जाती है। पिछली सरकार में हुए दंगे के कारण यहाँ के कई गाँवों और शहरों को संवेदनशील घोषित कर दिया गया है। मुजफ्फरनगर में मुस्लिमों की संख्या 5,87,191 है। यह मुजफ्फरनगर की कुल आबादी का 41% है। लेकिन योगी आदित्यनाथ के कट्टर हिंदुत्ववादी छवि के कारण यह समुदाय भाजपा से कटा सा रहता है।

मुजफ्फरनगर में धर्म के आधार पर जनसंख्या

हिन्दू : 8,00,113 – 56.87%
मुस्लिम : 5,87,191 – 41.74%
ईसाई : 1,952 – 0.14%
सिख : 6,280 – 0.45%

एक तरह से देखा जाए तो मुजफ्फरनगर में दोनों धर्मों की समान आबादी है। अगर धर्म के आधार पर चुनावी समीकरण को देखा जाए तो इस बार निकाय चुनाव में भाजपा को मुजफ्फरनगर में अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ेगा। क्योंकि भाजपा खुद ही धर्म की राजनीति करती है, लेकिन इस बार जाति और धर्म की राजनीति से भाजपा खुद घिर गई है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को मुजफ्फरनगर में सभा को सम्बोधित करते हुए कहा था कि अगर निकाय चुनाव में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला तो पूरे मुजफ्फरनगर की तस्वीर बदल देंगे। उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा था कि पिछली सरकार ने केवल जनता को गुमराह किया है। मुख्यमंत्री योगी ने पूर्ववर्ती सपा सरकार पर हमला बोलते हुए कहा था कि पिछली सरकार के समय में अवैध तरीकों से बूचड़खानों को चलाया जाता था और सरकार उनकी पक्षधर बनी बैठी रहती थी। उद्योग, व्यवसाय और नौजवान उत्तर प्रदेश से पलायन कर रहे थे। लेकिन जब से भाजपा की सरकार आई है तब से प्रदेश में सुधार देखने को मिला है।

मुजफ्फरनगर दंगे का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तत्कालीन अखिलेश सरकार को जिम्मेदार ठहराया था। योगी ने जनता से भाजपा के पक्ष में वोट देने को कहा था और लोगों को यह भरोसा दिलाया था कि पार्टी उनके हित में कार्य करेगी।

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