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कांग्रेस नें मिश्रा को हटाने के लिए पेश किया महाभियोग, उप-राष्ट्रपति करेंगे फैसला

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा

कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी पार्टियों नें भारत के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (मुख्य न्यायाधीश) दीपक मिश्रा को हटाने के लिए महाभियोग की शुरुआत की है।

इन पार्टियों नें चीफ जस्टिस को हटाने के लिए 5 कारणों का हवाला दिया है। दीपक मिश्रा को हटाने के लिए इन पार्टियों नें विधानसभा के 71 सदस्यों के हस्ताक्षर करा लिए हैं। अब इस नोटिस को उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू के सामने रखा है।

उप-राष्ट्रपति इस नोटिस को स्वीकार भी कर सकते हैं और अस्वीकार भी कर सकते हैं। यदि नायडू इसे स्वीकार करते हैं, तो उसके बाद तीन लोगों की एक टीम बनेगी, जो दीपक मिश्रा पर लगे आरोपों की जांच करेगी।

यदि इस जांच में दीपक मिश्रा दोषी पाए जाते हैं, तो इस नोटिस को राष्ट्रपति के सामने रक्षा जाएगा, जो इस मामले में अंतिम फैसला लेंगे।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल चीफ जस्टिस पर मुख्य आरोप यह है कि वे एक पार्टी विशेष का समर्थन करते हैं और इसके लिए वे कई मामलों को नियमों का उल्लंघन कर ऐसे जजों को देते हैं, जो पक्षपात करते हैं।

आपको जज लोया की मौत का मामला याद होगा, जिसमें भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह का नाम भी आया था। दरअसल जज लोया सोहराबुद्दीन का मामला देख रहे थे, जिसमें उनका फेक एनकाउंटर होने का आरोप था।

इस मामले की सुनवाई के दौरान जज लोया की मौत हो गयी थी, जिसे बहुत से लोगों नें रहस्यमयी बताया था।

जज लोया मौत के मामले में पक्षपात जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दी गयी थी, जिसके बाद इस मामले में सुनवाई शुरू की गयी थी।

दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट नें इस मामले में फैसला सुनाते हुए जज लोया की मौत को प्राकृतिक बताते हुए पीआईएल को खारिज कर दिया था, जिसके बाद दीपक मिश्रा को हटाने के लिए महाभियोग शुरू किया गया था।

आपको बता दें कि यह भारत के इतिहास में पहली बार होगा जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य जज पर ऐसे गंभीर आरोप लगे हैं और उन्हें हटाने के लिए प्रयास किये जा रहे हैं।

कौनसी पार्टियाँ इसमें शामिल हैं?

दीपक मिश्रा को हटाने के लिए शुरू हुए महाभियोग में मुख्य किरदार में कांग्रेस पार्टी है।

कांग्रेस पार्टी के सदस्य और जाने-माने वकील कपिल सिब्बल इसमें अहम् भूमिका निभा रहे हैं। इसके अलावा कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद भी इसमें अग्रिम भूमिका निभा रहे हैं।

कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद
कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद

पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ सदस्य मनमोहन सिंह इसमें शामिल नहीं हैं। सिंह के अलावा पी चिदम्बरम भी इस मामले से दूर ही हैं।

इन सदस्यों के दूर होनें पर यह भी बात उठायी गयी थी, कि कांग्रेस पार्टी के भीतर ही इस बात पर टकराव हो गया है, जिसे कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद नें निरस्त कर दिया।

सिब्बल नें इस मामले में बताया, “चूंकि बात देश के संविधान की है, इसलिए हमनें मनमोहन सिंह को शामिल नहीं किया है, क्योंकि वे देश के पूर्व-प्रधानमंत्री हैं। इसके अलावा जिन लोगों पर मुकदमे चल रहे हैं, उन्हें भी इससे बाहर रखा गया है।

तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और राष्ट्रिय जनता दल जैसी पार्टियों नें इसका समर्थन नहीं किया है।

बीजेपी की राय

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) इस पुरे मामले की निंदा कर रही है। भाजपा लगातार कांग्रेस के इस पक्ष की निंदा कर रही है और यह कह रही है कि कांग्रेस इस मामले को राजनीति के फायदे के लिए उठा रही है।

बीजेपी के मंत्री अरुण जेटली नें इस मामले में ट्वीट कर यह कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य जज को हटाने के लिए महाभियोग को राजनीति के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

‘महाभियोग न्याय-प्रणाली पर हमला’

केन्द्रीय मंत्री विजय गोयल नें कांग्रेस के इस फैसले को न्याय-प्रणाली पर हमला बताया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का यह फैसला ‘न्याय-प्रणाली पर हमला’ और ‘राजनैतिक फायदे’ के लिए किया गया फैसला है।

गोयल के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट द्वारा जज लोया पर दिए गए फैसले से कांग्रेस को धक्का लगा है और पार्टी अब बोखलाई हुई है।

‘कांग्रेस भारतीय संस्थानों पर भरोसा नहीं करती है’

बीजेपी के अन्य नेता किरेन रिजीजू नें इस मामले में कहा कि कांग्रेस को अब देश के संस्थानों पर भरोसा नहीं रहा है। रिजीजू नें ट्वीट करके बताया, “जब से देश की जनता का भरोसा कांग्रेस पार्टी से उठा है, तबसे कांग्रेस पार्टी का भरोसा भारत और इसके संस्थानों पर से उठ गया है।”

इमपीचमेंट यानी महाभियोग क्या है?

सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए प्रक्रिया का उल्लेख भारतीय संविधान के आर्टिकल 124(4) में किया है। यह आर्टिकल कहता है कि मुख्य जज को हटाने के लिए इस मामले को लोकसभा में 100 सदस्यों द्वारा और राज्य सभा में 50 सदस्यों द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए।

यदि ऐसा हो जाता है तो लोकसभा की स्पीकर या राज्यसभा के चेयरमैन इसकी जांच के लिए एक टीम का गठन करेंगे।

इस टीम में एक सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाई कोर्ट के मुख्य जज और एक अन्य सदस्य शामिल होंगें। यह टीम सभी आरोपों की जांच करेगी और आरोपित जज को इसकी सफाई देने को कहेगी।

इन सबके बाद यह टीम यह सुनिश्चित करेगी कि लगे हुए आरोप सही है या नहीं।

यदि इन्हें लगता है कि आरोप सही हैं, तो इस मामले को आगे बढाया जाएगा।

मामले को आगे फिर से सदन में लाया जाएगा और इसपर बहस होगी। यदि सदन में इसपर सहमती बन जाती है, तो इसे राष्ट्रपति के सामने भेजा जाएगा।

राष्ट्रपति इस मामले में अंतिम फैसला करेंगे कि मुख्य न्यायाधीश को हटाया जाए या रखा जाए।