उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव : इलाहाबाद में अपना गढ़ बचाने में जुटी भाजपा

उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव
भाजपा के सामने इलाहाबाद बचाने की चुनौती
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उत्तर प्रदेश निकाय चुनावों की शुरुआत हो चुकी है। अभी भी सभी पार्टियां अपना चुनावी समीकरण साधने में लगी है। प्रधानमंत्रियों के शहर और प्राचीन काल से ही देश में शिक्षा का केंद्र रहे इलाहाबाद में निकाय चुनावों को लेकर सियासत गरमा गई है। भाजपा और कांग्रेस के बीच इलाहाबाद को लेकर हमेशा से ही टकराव की स्थिति बनी रहती है। नेहरू-गाँधी परिवार का पुश्तैनी निवास होने की वजह से आजादी के बाद दशकों तक इलाहाबाद कांग्रेस का गढ़ रहा था। 90 के दशक में राम मंदिर आन्दोलन के दौरान इलाहाबाद हिंदुत्व का केंद्र बन गया था और भाजपा का मजबूत गढ़ बनकर उभरा। भाजपाई दिग्गज मुरली मनोहर जोशी 3 बार इलाहाबाद से लोकसभा सांसद रहे। इलाहाबाद की जनता ने जोशी जी को इलाहाबाद के विकास पुरुष के तगमे से भी नवाजा।

भाजपा के दौर के बाद इलाहाबाद में समाजवादी पार्टी का बोलबाला रहा। लेकिन 2014 लोकसभा चुनावों में भाजपा ने इलाहाबाद की दोनों लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज कर जोरदार वापसी की। 2017 में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा और उसके सहयोगी अपना दल ने इलाहाबाद जिले की 12 में से 9 विधानसभा सीटों पर अपना कब्जा जमाया था। एक सीट सपा के कब्जे में रही वहीं 2 सीटों पर बसपा ने कब्जा जमाया। इस वजह से निकाय चुनाव इलाहाबाद में भाजपा के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुके हैं। भाजपा ने मौजूदा मेयर और योगी सरकार के मंत्री नंदगोपाल गुप्ता नंदी की पत्नी अभिलाषा गुप्ता को अपना उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस ने विजय मिश्रा को अपना मेयर उम्मीदवार बनाया है। समाजवादी पार्टी ने मेयर प्रत्याशी के तौर पर विनोद चंद दुबे को नामांकित किया है। बसपा ने रमेश चंद्र केसरवानी को अपना उम्मीदवार बनाया है।

इलाहाबाद की वर्तमान मेयर अभिलाषा गुप्ता है जो कि भाजपा नेता है। इलाहाबाद निकाय चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी की मुश्किलें बढ़ती जा रही है। उत्तर प्रदेश के इलाहाबद जिले में बीजेपी की ओर से रविवार को केपी इंटर कॉलेज में आयोजित प्रबुद्धजन सम्मलेन के दौरान कुछ लोगो ने हंगामा किया। लोगों का आरोप था कि टिकट वितरण को लेकर उनके समुदाय के लोगों का ध्यान नहीं रखा गया है। कार्यक्रम के दौरान टिकट ना मिलने से नाराज लोगों और आयोजकों के बीच नोंकझोंक भी हुई। जिससे पार्टी को लोगों के बीच शांति बहाल करने में काफी मशक्त करनी पड़ी और अंत में रुष्ट लोगों को मनाया गया।

दरअसल इलाहाबाद निकाय चुनाव में टिकट को लेकर कायस्थ समाज बीजेपी से नाराज हो गया। इस नाराजगी को दूर करने के लिए केपी ट्रस्ट की ओर से प्रबुद्धजन सम्मलेन का आयोजन कराया गया। आपको बता दें कि केपी ट्रस्ट कायस्थों का बहुत बड़ा ट्रस्ट माना जाता है। कार्यक्रम में बीजेपी के यूपी प्रभारी और पार्टी के उपाध्यक्ष ओम माथुर समेत प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा मंत्री आशुतोष टंडन भी मौजूद थे। लेकिन कार्क्रम के दौरान कुछ लोगो ने हंगामा करना शुरू कर दिया। उन लोगों का कहना था कि हम केवल मतदाता के रूप में नहीं रहेंगे। कायस्थ समाज के लोगों का कहना था कि चुनाव में हमें भी प्रतिनिधित्व करने का मौका मिलना चाहिए।

आपको बता दें कि इलाहाबाद में कायस्थों की संख्या अन्य जातियों से कहीं ज्यादा है। लेकिन टिकट बँटवारे को लेकर यह जाति भाजपा से नाराज दिख रही है। अगर ऐसा ही रहा तो भाजपा का चुनावी समीकरण बिगड़ सकता है। जानकारी के अनुसार इलाहाबाद में 12% ब्राह्मण और 10% राजपूत रहते है, जिनका वोट भाजपा के पक्ष में जाता है। लेकिन इस बार कायस्थों की नाराजगी भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है।

इलाहाबाद के धार्मिक आँकड़ें

1 – हिन्दू – 88%
2 – मुस्लिम – 9 %
3 – ईसाई – 0.7%
4 – सिख – 1%
5 – अन्य – 2%

इलाहाबाद की राजनीती इस बार कुछ और कह रही है। कांग्रेस, सपा,. बसपा और भाजपा अपने-अपने तरीकों से मतदाताओं को लुभाने में लगे हैं। शहरी क्षेत्रों में भाजपा की अच्छी पकड़ है और उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी योगी सरकार के 3 मंत्री इलाहाबाद से हैं। आजादी के बाद से अब तक भारतीय जनता पार्टी ने इलाहाबाद से चार बार लोकसभा चुनाव जीता है। इलाहाबाद के विकास पुरुष कहे जाने वाले मुरली मनोहर जोशी ने लगातार 3 बार भाजपा के टिकट पर इलाहाबाद से जीत दर्ज की है। कांग्रेस सात बार इलाहाबाद की सीट जीत चुकी है। वहीं समाजवादी पार्टी भी दो बार इलाहाबाद लोकसभा सीट पर जीत दर्ज कर चुकी है। वर्तमान में भाजपा के श्यामा चरण गुप्ता इलाहाबाद से लोकसभा सांसद है।

निकाय चुनाव को लेकर भाजपा बहुत गंभीर दिख रही है। इसके मद्देनजर पार्टी ने कार्यकर्ताओं को सख्त हिदायत दे रखी है। पार्टी का कहना है कि जिस क्षेत्र में बीजेपी कमजोर दिख रही है उसपर ध्यान देने की ज्यादा जरुरत है। यह जिला हिन्दू बाहुल्य है और यहाँ मुस्लिम आबादी मात्र 9% है जिससे भाजपा के चुनावी मुद्दों को एक आधार मिलने का आसार दीखता है। इस बार समाजवादी पार्टी चुनवी मैदान में भाजपा की आलोचना करती नजर आ रही है, और दूसरी तरफ बहुजन समाजवादी पार्टी के चुनाव में सिरकत करने से भाजपा अपने आप को निकाय चुनाव में घिरता देख रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि यादव वोट तो सपा के साथ है लेकिन बसपा के आने से दलितों के वोट में फेरबदल की आशंका जताई जा रही है।

भाजपा अपने संकल्प पत्र का सहारा लेकर निकाय चुनाव से पार पाने में लगी है। इलाहाबाद की राजनीतिक बयार चौतरफा हो गई है, इसलिए चुनावी निष्कर्ष निकलना मुश्किल हो रहा है। इलाहाबाद का शहरी क्षेत्रफल 70 वर्ग किलोमीटर है। यहाँ की कुल आबादी 1,117,094 है जिसमें पुरुषों की संख्या 6,30,577 और महिलाओं की आबादी 5,37,808 है। इलाहाबाद का लिंग अनुपात 853 है और साक्षरता 84.08% है।

इलाहाबाद में 26 नवंबर को मतदान होना है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या भाजपा इलाहाबाद में अपना जीत का क्रम बरकरार रखने में सफल रह पाएगी?