बुधवार, अक्टूबर 23, 2019

ई-नाम से नहीं जुड़ पाईं बिहार की मंडियां, फसलों का उचित दाम पाने से किसान महरूम

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नई दिल्ली/पटना, 10 अक्टूबर (आईएएनएस)। देश के प्रमुख कृषि उत्पादक राज्यों की सैकड़ों मंडियां इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म ई-नाम पर दस्तक दे चुकी हैं, लेकिन बिहार की एक भी मंडी अब तक इससे नहीं जुड़ पाई है। प्राइस डिस्कवरी का उचित मंच नहीं होने से फसलों की कटाई के समय किसानों को औने-पौने दाम पर अपनी फसल बेचनी पड़ती है।

किसानों को उनके उत्पादों के लिए बेहतर दाम की तलाश करने और आसानी से कृषि उत्पाद बेचने की सुविधा प्रदान करने के मकसद से केंद्र सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार यानी ई-नाम का मंच उन्हें मुहैया करवाया है।

सरकार ने इस साल ई-नाम से देशभर की 1,000 मंडियों को जोड़ने का लक्ष्य रखा है, लेकिन बिहार की ओर से इसके लिए अब तक कोई प्रस्ताव नहीं आया है।

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय में सचिव संजय अग्रवाल ने हाल ही में बताया कि ई-नाम से कृषि उत्पादक मंडियों को जोड़ने के लिए बिहार से कोई प्रस्ताव नहीं मिला है।

इस बाबत बिहार के कृषि सचिव श्रवण कुमार ने आईएएनएस को बताया कि बिहार में इस वक्त 54 एपीएमसी (कृषि उत्पाद विपणन समिति) की मंडियां हैं, लेकिन इन मंडियों को कुछ साल पहले प्रदेश सरकार ने शुल्क मुक्त घोषित कर दिया जिसके कारण ई-नाम के मानदंड पूरा नहीं होने से इन्हें ई-नाम से जोड़ने में कठिनाई आ रही है।

उन्होंने कहा, इस दिशा में केंद्र सरकार से हमारी बातचीत चल रही है और आने वाले दिनों में ई-नाम से बिहार की मंडियों को जोड़ने का प्रस्ताव दिया जा सकता है।

हालांकि इन मंडियों पर फिर से मंडी शुल्क लागू करने के किसी प्रस्ताव के संबंध में उन्होंने कुछ नहीं बताया। कुमार ने यह भी बताया कि प्रदेश सरकार किसानों को उनकी फसलों का उचित भाव दिलाने की दिशा में प्रयासरत है और इसी प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म बनाने को लेकर भी विचार किया जा रहा है।

उन्होंने यह भी बताया कि बिहार की कृषि उत्पादक मंडियों में बेहतर ढांचागत सुविधाएं प्रदान करने की दिशा में सरकार काम कर रही है।

बिहार में कृषि विभाग के एक अन्य अधिकारी (आधिकारिक बयान देने के लिए अधिकृत नहीं) ने बताया कि प्रदेश की कई मंडियों में मार्केट यार्ड की सुविधा तैयार की गई है।

उधर, बिहार के मधेपुरा जिले के महाराजगंज गांव निवासी पलट प्रसाद यादव ने बताया कि बिहार में गेहूं और धान के अलावा किसी भी फसल की सरकारी खरीद नहीं होने से किसानों को अपनी फसल औने-पौने दाम पर बेचनी पड़ती है।

उन्होंने कहा, सरकार द्वारा तय फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से बिहार के ज्यादातर किसान महरूम रहते हैं। धान और गेहूं की तो थोड़ी बहुत खरीद होती है, लेकिन अन्य फसलों की खरीद बिल्कुल नहीं होती है।

उन्होंने कहा, गेहूं और धान की भी सरकारी खरीद तब शुरू होती है, जब किसान अपनी फसल बेच देते हैं। साथ ही, समय पर पैसे नहीं मिलने के कारण किसान सरकारी खरीद एजेंसी को देने के बजाय गांव के व्यापारियों के हाथों ही अपनी फसल बेचना पसंद करते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 में राष्ट्रीय कृषि बाजार के लिए ई-ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म ई-नाम की प्रायोगिक परियोजना लांच की थी।

–आईएएनएस

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